कला-संस्कृति

बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए…

‘ठुमरी की रानी’ के रूप में आदर प्राप्त शास्त्रीय संगीत गायिका गिरिजा देवी का मंगलवार रात करीब 9 बजे कोलकाता में दिल का दौरा...

मंच पर स्त्री

मोना झा बिहार में रंगमंच का एक जाना पहचाना नाम है मोना झा का . ढाई दशक की रंगमंच की अपनी यात्रा में मोना ने...

‘महिषासुर और दुर्गा’ प्रसंग: लोकशायर संभाजी से बातचीत

 पिछले दिनों लोकशायर संभाजी भगत का नया अलबम ' ब्लू नेशन'  जे एन यू में रिलीज हुआ. गीत डा. आमोल देवलेकर  ने लिखा है....

पतनशील पूर्वप्रेमिका कंगना हाज़िर हो !

नीलिमा चौहान पेशे से प्राध्यापक नीलिमा 'आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. प्रकाशित पुस्तकें: पतनशील पत्नियों के नोट्स, 'बेदाद ए इश्क' (संपादित) संपर्क...

क्या बिहारी फिल्मों की खोई प्रतिष्ठा वापस लायेगी ‘मिथिला मखान’ ?

इति शरण  इन दिनों बिहारी फिल्मों का मतलब गंदे और भद्दे पोस्टर वाली भोजपुरी फिल्मों को ही समझ लिया गया है। जिनके पोस्टर और नाम...

रील और रीयल ज़िदगी: एक इनसाइड अकाउंट

असीमा भट्ट रंगमंच की कलाकार,सिनेमा और धारवाहिकों में अभिनय, लेखिका संपर्क : asimabhatt@gmail.com प्रत्युषा मर गयी. वह क्यों मरी? क्या हुआ उसके साथ यह अटकलें...

द्रौपदी ! भारतीय सेना बलात्कारी नहीं,राष्ट्रवादी है (?!)

21  सितंबर को हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग ने महाश्वेता देवी को श्रद्धांजलि देने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया. इए मौके पर...

उस आख़िरी दृश्य में अनारकली !

डिस्क्लेमर: इस फिल्म के साथ हालिया प्रदर्शित फिल्म पिंक और पार्च्ड की एकाधिक बार तुलना इसलिए कि ये सारी फ़िल्में स्त्रीवादी फ्रेम की दावेदारी...

प्रतिरोध का सिनेमा उत्सव भी है ,और आंदोलन भी

अनुपम सिंह अनुपम सिंह दिल्ली वि वि में शोधरत हैं. संपर्क :anupamdu131@gmail.com जब  भारतीय संस्कृति के नाम पर सामंतवादी और पुरुषवादी मूल्यों के पुनर्रस्थापन  की...

उन्नीसवें भारत रंग महोत्सव में स्त्रियों की भागीदारी

मंजरी श्रीवास्तव एक लम्बी कविता 'एक बार फिर नाचो न इजाडोरा' बहुचर्चित.नाट्य समीक्षक,कई नाट्य सम्मान की ज्यूरी में शामिल. संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com पिछले...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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