जीएसटी इम्पैक्ट: क्या महिलायें भेजेंगी वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री को सैनिटरी पैड (!)

आधी रात को देश की आर्थिक आजादी का बिम्ब रचते हुए 30 जून की रात 12 बजे देश में एक टैक्स क़ानून, जीएसटी (...

दिल्ली में नाइजीरियन यौन- दासियाँ

OLUTOSIN OLADOSU ADEBOWALE OLUTOSIN OLADOSU ADEBOWALE  स्त्री अधिकार कार्यकर्ता हैं, नागारिक पत्रकार हैं. वे बच्चों पर यौन हिंसा के खिलाफ काम करती हैं...

कृषि प्रधान देश में महिला खेतिहर की दैन्य वास्तविकता

मंजू शर्मा सोशल मीडिया में सक्रिय मंजू शर्मा साहित्य लेखन की ओर प्रवृत्त हैं .संपर्क : ई मेल- manjubksc@yahoo.co.in आंगन के, आंगन के बिरवा...

जजिया कर से भी ज्यादा बड़ी तानाशाही है लहू पर लगान

संपादकीय  सोचता हूँ कि सैनिटरी पैड पर लगाया जाने वाला टैक्स क्या पुरुष लिंग के अहम से उपजा निर्णय नहीं है? क्या निर्णय लेने वाली...

दो लाख ले लो और मेरा पति लौटा दो: महाराष्ट्र सरकार से किसान विधवायें

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में कीटनाशकों के छिडकाव से मारे गये किसानों की विधवायें भीख मांगकर सरकार को दो लाख रूपये देना चाहती हैं,...

ग्रामीण महिलाओं के श्रम का राजनीतिक अर्थशास्त्र

आकांक्षा  महात्मा  गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग में शोधरत। संपर्क : ई मेल-akanksha3105@gmail.com महिला श्रम की बात करते समय हमारे मस्तिष्क में जो विचार...

आदिवासी बच्चों के स्कूल बंद कर रही सरकार और लूट लिये आदिवासी मद के...

महाराष्ट्र में आदिवासी मद के पैसों  के  बड़े बंदरबाँट  का मामला सामने आया है. संघ प्रायोजित स्कूलों  और निजी स्कूलों के हित में सरकारी...

भगवान! ‘एक कटोरा भात खिला दो बस, भारत में भात नहीं मिला’

ज्योति प्रसाद  शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com स्वर्ग और नरक के बीच भूखी बच्ची वहाँ भी फंस गयी, उम्र 11 साल. क्या...

मीडिया से मजदूर गायब, सेक्सी माडल्स बिल्डिंग बना रहे हैं !

आदित्य कुमार गिरि शोधार्थी,कलकत्ता विश्वविद्यालय,ईमेल आईडी-adityakumargiri@gmail.com टीवी पर 'अल्ट्राटेक सीमेंट' का नया विज्ञापन आ रहा है.सुंदर और सेक्सी मॉडल्स बिल्डिंग  बना रहे हैं.मतलब विज्ञापन...

जन्मदिन पर झूठ, फर्जी जश्न और निर्दोषों का घर-बदर: क्या खूब मोदी जी!

1. सरदार सरोवर बाँध की ऊँचाई 138.68 मीटर है और वह 1979 में नर्मदा ट्रिब्यूनल में दिए गए फैसले के        ...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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