महिला मताधिकार पर बहस : सन्दर्भ बिहार विधान परिषद ( १९२१ , १९२५, १९२९...

डा मुसाफिर बैठा डा मुसाफिर बैठा कवि और सामाजिक -सांस्कृतिक विषयों के चिन्तक हैं . सम्प्रति बिहार विधान परिषद् में कार्यरत हैं. संपर्क : 09835045947,...

आरक्षण के भीतर आरक्षण के पक्ष में बसपा का वाक् आउट : नौवीं क़िस्त

महिला आरक्षण को लेकर संसद के दोनो सदनों में कई बार प्रस्ताव लाये गये. 1996 से 2016 तक, 20 सालों में महिला आरक्षण बिल...

मायावती का चरित्रहनन और राजनीतिक पतन का मर्सिया

निखिल आनंद एक ओबीसी-सबल्टर्न पत्रकार एवं सामाजिक- राजनीतिक कार्यकर्ता. संपर्क: nikhil.anand20@gmail.com, 09939822007मायावती हाशिये से आगे बढ़कर ताकतवर राजनीतिक शख्सियत के रूप में स्थापित मायावती...

बिहार के दूसरे शेल्टर होम से भी आ रही हैं बुरी खबरें: सीतामढ़ी ...

सुशील मानव    हैवानियत की आग सिर्फ मुज़फ्फ़रपुर में हीं नहीं लगी है। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक़ उत्तरी बिहार में मुजफ्फरपुर के पड़ोस...

हमारी पार्टी गरीबों की पार्टी है : दीपंकर भट्टाचार्य

बिहार चुनाव का तीसरा फेज 28 को है. छोटे -बड़े दलों के नेता हवाई मार्ग ( हेलीकॉप्टरों) से राज्य के खेत -खलिहानों में उतर...

एपवा ने योगी सरकार के खिलाफ राज्यपाल को सौंपा ज्ञापन

(एपवा) ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को प्रदेश में महिलाओं , बच्चियों , दलितों , आदिवासियों व अल्पसंख्यकों पर हिंसा और भीड़ द्वारा बढती हिंसात्मक घटनाओं को लेकर जिलाधिकारी के माध्यम से ज्ञापन सौंपा. एपवा ने आरोप लगाया कि इन घटनाओं को रोकने में योगी सरकार नाकाम ही नहीं हो रही है बल्कि जो भी लोग इन घटनाओं के खिलाफ बोल रहे है उनके साथ तानाशाही भरा रवैया अपनाते हुए उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है. एपवा ने मांग किया कि बढ़ते दमन और हिंसा की घटनाओं पर तत्काल रोक लगाई जाय. ऐपवा ने पूरे उत्तर प्रदेश में 20 अगस्त को इन मुद्दों पर एक साथ विरोध प्रदर्शन किया.

पत्थलगड़ी के खिलाफ बलात्कार की सरकारी-संघी रणनीति (!)

अश्विनी कुमार पंकज  क्या बिरसा मुंडा की धरती खूंटी से शुरू हुए पत्थलगडी आंदोलन को वहां  21 जून को 5 नुक्कड़ नाट्यकर्मियों  से हुए सामूहिक...

हमें खत्म करने के पहले वे लोकतंत्र को खत्म करेंगे

स्त्रीकाल संपादकीय टीम  चाहे कोई भी संघर्ष हो-जाति के खिलाफ, ब्राह्मणवाद के खिलाफ, पितृसत्ता के खिलाफ, तानाशाही के खिलाफ- वह  तभी तक जारी रह सकता...

मेरी ज़िंदगी का सिर्फ़ एक तिहाई हिस्सा ही मेरा है: जयललिता

जयललिता ने तमिलनाडु की  पुरुष प्रधान राजनीति में अपनी जगह बनाई. अम्मा के रूप में राज्य की जनता के बीच लोकप्रिय हुईं. अंतरविरोधों से...

महिला आरक्षण पर जदयू की बदली राय: कहा पहले 33% पास हो फिर वंचितों...

उत्पलकांत अनीस  महिला आरक्षण विधेयक के 20 साल पूरे होने पर एनएफआईडव्ल्यू ने आयोजित किया सेमिनार, पूछा सवाल कि 70 सालों में 12% तो 33%...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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