अपने ही पराभव का जश्न मनाती है स्त्रियाँ ! ( दुर्गा पूजा का...

नूतन मालवी <सत्यशोधक आन्दोलन की कार्यकर्ता, कई किताबें प्रकाशित, सत्यशोधक स्त्रीवाद नामक एक किताब प्रकाश्य.संपर्क : ई मेल- nootan.malvi@gmail.com नौ दिनों में दुर्गा की...

थेरीगाथा , बौद्ध धर्म और स्त्रियाँ

रजनीश कुमार रजनीश कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में बौद्ध अध्ययन विभाग में शोधरत हैं. रजनीश से इनके मोबाइल न 09911639095 पर संपर्क किया जा सकता...

बोल्गा से गंगा, तुम्हारी क्षय हो के रचयिता ने दी समाज को नई उर्जा:...

अरुण नारायणकला संस्कृति एवं युवा विभाग और पटना संग्रहालय की संयुक्त पहल ‘जब हम...

ये भागी हुई लड़कियाॅं ..!

यूॅं तो लड़कियाॅं आज ही नही भाग रही है , वो तो सदियों से भाग रही है, मन ही मन भाग रही है,ख्वाब में भाग रही है, उन घरेलू गुफाओं से धीरे-धीरे सकरे रास्तों से आडे-तिरछे निकल कर भाग रही है, किसी ने उनकी डायरी के पन्ने कभी खोल कर नही देखे वह वहाॅं भी भाग ही रही है, लड़कियों की कुल तादाद का बड़ा हिस्सा भाग ही रहा है,....

पटना में याद की गयीं रमणिका गुप्ता

हित्यिक संगठन बागडोर, दूसरा शनिवार, समन्वय और कोरस की संयुक्त पहल पर पटना कॉलेज सेमिनार हॉल में इसका आयोजन संपन्न हुआ।उपस्थित लोगों ने रमणिका गुप्ता की फोटो पर पुष्पांजलि अर्पित की, उनसे जुड़ी स्मृतियां साझी की और उनकी कविताओं का भी पाठ किया।

सांप्रदायिक, जातिवादी, भाषा-वर्चस्ववादी ‘बिहार संवादी’ (दैनिक जागरण का आयोजन) छोड़ गया कई सवाल

अनन्त पटना में आयोजित दैनिक जागरण के ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम को जहां लेखक 'अनंत' साम्प्रदायिक, दलित विरोधी बता रहे हैं, भाषा के सवाल पर वर्चस्ववादी...

विमर्श नहीं, विचारधारा : अस्मितावाद की जगह आंबेडकर-चिंतन

बजरंग बिहारी तिवारी बजरंग बिहारी तिवारी हिंदी के प्रसिद्द आलोचक हैं।  दलित मुद्दों पर इनकी प्रतिबद्धता जगजाहिर है और यही इनके आलोचकीय व्यक्तिव की...

एक सांस्कृतिक आंदोलन के चार साल

प्रमोद रंजन व रवि प्रकाश ( देश में एक धीमा सांस्कृतिक आन्दोलन करवट ले रहा है , एक क्रांति घटित हो रही है , जिसकी...

महाराष्ट्र में बौद्ध विवाह क़ानून: नवबौद्ध कर रहे स्वागत और विरोध

संजीव चंदन महाराष्ट्र की भाजपा सरकार द्वारा हिन्दू विवाह क़ानून से अलग बौद्ध विवाह कानून बनाने की पहल 2015 से ही शुरू हो गयी थी,...

लेखक संगठन (प्रलेस) ने स्त्री अस्मिता पर मर्द दरोगा को दी तरजीह

प्रलेस के इस महिलाविरोधी रवैये से अब महिलाओं को कुछ करना चाहिए। चुप रहने और बर्दाश्त करने की भी एक सीमा होती है। अब कहना ज़रूरी हो गया है। जब सिर्फ ऐतराज और शिकायत दर्ज करने से कोई सुनवाई नहीं हो रही है तो शायद ज्यादा कड़ा कदम उठाना चाहिए। लगता है कि सभी महिला सदस्यों को प्रलेस से सामूहिक इस्तीफा देने जैसा कदम उठाना चाहिए।
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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