कथित उदार नजरिया भी ब्राह्मणवादी नजरिया है

स्त्रीकाल डेस्क  पीपल्स पार्टी ऑफ इंडिया की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और बहुजन समाज की जानी मानी नेत्री डॉ मनीषा बांगर पिछले दिनों कनाडा के ब्राह्मप्टन शहर...

डॉक्टर मनीषा बांगर ‘वायस ऑफ पीपल’ सम्मान से हुईं सम्मानित !

 राजीव कुमार सुमन    14 सिंतबर 2018 को दिल्ली के माता सुंदरी रोड पर स्थित एवान-ए-गालिब ऑडिटोरियम में पल-पल न्यूज वेब पोर्टल की तरफ से...

छत्तीसगढ़ में दुर्गापूजा आयोजन समिति के खिलाफ केस दर्ज:आदिवासियों की धार्मिक भावना भड़काने का...

नवल किशोर कुमार छत्तीसगढ के कांकेर जिले के पखांजुर थाने में स्थानीय आदिवासी समुदाय के लोगों ने दुर्गापूजा समिति के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है।...

विमर्श नहीं, विचारधारा : अस्मितावाद की जगह आंबेडकर-चिंतन

बजरंग बिहारी तिवारी बजरंग बिहारी तिवारी हिंदी के प्रसिद्द आलोचक हैं।  दलित मुद्दों पर इनकी प्रतिबद्धता जगजाहिर है और यही इनके आलोचकीय व्यक्तिव की...

बोल्गा से गंगा, तुम्हारी क्षय हो के रचयिता ने दी समाज को नई उर्जा:...

अरुण नारायणकला संस्कृति एवं युवा विभाग और पटना संग्रहालय की संयुक्त पहल ‘जब हम...

नरसंहारों का स्त्रीपक्ष

संजीव चंदन बिहार के जहानाबाद कोर्ट ने सेनारी नरसंहार (जहां सवर्ण जाति के लोग मारे गये थे) के मामले में अपना निर्णय सुनाया है. कई...

वहशी राष्ट्रवाद: अपने ही नागरिकों के खिलाफ जंग

इति शरण युवा पत्रकार. सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता. संपर्क : ई मेल- itisharan@gmail.com देश में कुछ दिनों पहले असहिष्णुता का मामला खूब गरमाया था, जिसके विरोध...

सांप्रदायिक, जातिवादी, भाषा-वर्चस्ववादी ‘बिहार संवादी’ (दैनिक जागरण का आयोजन) छोड़ गया कई सवाल

अनन्त पटना में आयोजित दैनिक जागरण के ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम को जहां लेखक 'अनंत' साम्प्रदायिक, दलित विरोधी बता रहे हैं, भाषा के सवाल पर वर्चस्ववादी...

बहुजन सांस्कृतिक आगाज : महिषासुर शहादत दिवस

बहुजन सांस्कृतिक आगाज : महिषासुर शहादत दिवस ( चिंतक और लेखक प्रेमकुमार मणि से बातचीत, जिन्होंने ' किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन' लेख लिखा.'...

त्योहारों के बहुजन सन्दर्भ

नूतन मालवी  त्योहारों का सांस्कृतिक महत्व है.  वे भाईचारे, प्रेम व एकता के प्रतीक माने जाते हैं.   इनमें से कई सिन्धु घाटी की सभ्यता के...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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