छत्तीसगढ़ में दुर्गापूजा आयोजन समिति के खिलाफ केस दर्ज:आदिवासियों की धार्मिक भावना भड़काने का...

नवल किशोर कुमार छत्तीसगढ के कांकेर जिले के पखांजुर थाने में स्थानीय आदिवासी समुदाय के लोगों ने दुर्गापूजा समिति के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है।...

‘मैं हिन्दू क्यों नहीं’ के लेखक पर हमला, ‘दुर्गा’ के कथित अपमान के आरोप...

स्त्रीकाल डेस्क  हिन्दू भावनाओं के कथित अपमान के आरोप में देश भर में लेखकों, बुद्धिजीवियों पर होने वाले हमलों की कड़ी में कुछ और मामले...

मिथक और स्त्री आंदोलन का अगला चरण

संजीव चंदन ‘रिडल्स इन हिन्दुइज्म’ में डा. बाबा साहेब अंबेडकर इतिहास लिखने से ज्यादा इतिहास की व्याख्या को महत्वपूर्ण मानते हैं. भारतीय इतिहास के बहुत...

नरसंहारों का स्त्रीपक्ष

संजीव चंदन बिहार के जहानाबाद कोर्ट ने सेनारी नरसंहार (जहां सवर्ण जाति के लोग मारे गये थे) के मामले में अपना निर्णय सुनाया है. कई...

वहशी राष्ट्रवाद: अपने ही नागरिकों के खिलाफ जंग

इति शरण युवा पत्रकार. सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता. संपर्क : ई मेल- itisharan@gmail.com देश में कुछ दिनों पहले असहिष्णुता का मामला खूब गरमाया था, जिसके विरोध...

देवयानी

 प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं. संपर्क : manipk25@gmail.com मिथकों की ब्राह्मणवादी पितृसत्ताक व्याख्या...

पाकिस्तानी इस्लाम ने ली कंदील की जान

आशीष कुमार ‘‘अंशु’ आशीष कुमार ‘‘अंशु’ देश भर में खूब घूमते हैं और खूब रपटें लिखते हैं . फिलहाल विकास पत्रिका 'सोपान' से...

धर्मराष्ट्रवाद और राजनीति-खतरनाक गठजोड़ की नयी परंपरा

1914-15 में ही शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था. वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें...

भारत माता जार-बेजार रो रही है

 प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं. संपर्क : manipk25@gmail.com ( 'भारत माता की जय'...

होली : एक मिथकीय अध्धयन

(कँवल भारती) डा. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक “फिलोसोफी ऑफ हिन्दुइज्म” में एक जगह लिखा है, “आज के हिंदू सबसे प्रबल विरोधी मार्क्सवाद के हैं. और...
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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