उन्नीसवें भारत रंग महोत्सव में स्त्रियों की भागीदारी

मंजरी श्रीवास्तव एक लम्बी कविता 'एक बार फिर नाचो न इजाडोरा' बहुचर्चित.नाट्य समीक्षक,कई नाट्य सम्मान की ज्यूरी में शामिल. संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com पिछले...

ब्रजेश ठाकुर की बेटी के नाम एक पत्र: क्यों लचर हैं पिता के बचाव...

संजीव चंदन निकिता आनंद कैसी हैं? जाहिर है आप परेशान होंगी अपने पिता के लिए. आप कम से कम उतनी प्रसन्न तो नहीं होंगी जितना आपके पिता...

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ

'स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत आज  इलाहाबाद  विश्वविद्यालय की  पहली महिला  छात्रसंघ  अध्यक्ष ऋचा सिंह  की कहानी उनके अपने शब्दों में ....

यूपी का देवरिया भी बना मुजफ्फरपुर: संचालिका और उसका पति गिरफ्तार

स्त्रीकाल  डेस्क  बिहार के मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम में बच्चियों के साथ हुए रेप के खुलासे और उसपर हो रहे प्रतिरोध के बीच उत्तर प्रदेश...

आदिवासी लेखिकाओं ने की आदिवासी महिलाओं के खिलाफ लेखन की निंदा लेकिन लेखन पर...

देश की वरिष्ठ और युवा आदिवासी महिलाओं ने एक स्वर से हांसदा सौभेन्द्र शेखर के लेखन की भर्त्सना की है जिसमें उसने आदिवासी स्त्रियों...

डा. अम्बेडकर के पोते को नक्सली बताने और प्रधानमंत्री की जान को खतरा बताने...

संजीव चंदन प्रधानमंत्री को  मारने की योजना वाले और बाबा साहेब के पोते और रिपब्लिकन नेता, प्रकाश अम्बेडकर को माओवादी बताने वाले  पत्रों  पर उठे...

दलित छात्रा को मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय ने चयन के बाद भी नहीं दिया...

स्त्रीकाल डेस्क  मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय, भोपाल अपने एक विवादास्पद फैसलों के कारण सुर्ख़ियों में है. इसने अपने यहाँ एक पाठ्यक्रम के लिए चयनित दलित...

12वीं की छात्रा ने चलाई मुहीम: बुलेट ट्रेन नहीं सुरक्षित रेलवे दो मोदी सर

मुंबई में हुई भगदड़ ने मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट  के खिलाफ गुस्सा और भड़का दिया है। मुंबई के एक स्कूलल में 12वीं...

अपनी -अपनी वेश्यायें : सन्दर्भ : जे एन यू सेक्स रैकेट

संजीव चंदन प्रोफ़ेसर अमिता सिंह , सोचता हूँ कि आपकी 'जे एन यू सेक्स रैकेट वाली रिपोर्ट'  पर क्या कहूं. आजकल चिट्ठियाँ लिखने का चलन...

सांप्रदायिक, जातिवादी, भाषा-वर्चस्ववादी ‘बिहार संवादी’ (दैनिक जागरण का आयोजन) छोड़ गया कई सवाल

अनन्त पटना में आयोजित दैनिक जागरण के ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम को जहां लेखक 'अनंत' साम्प्रदायिक, दलित विरोधी बता रहे हैं, भाषा के सवाल पर वर्चस्ववादी...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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