क्रान्ति के कपड़े

अर्चना वर्मा अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं.  ई मेल :  mamushu46@gmail.com 2007 के अन्तरराष्ट्रीय -वाणिज्य-मेले के समय 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में एक...

महिला मताधिकार पर बहस : सन्दर्भ बिहार विधान परिषद ( १९२१ , १९२५, १९२९...

डा मुसाफिर बैठा डा मुसाफिर बैठा कवि और सामाजिक -सांस्कृतिक विषयों के चिन्तक हैं . सम्प्रति बिहार विधान परिषद् में कार्यरत हैं. संपर्क : 09835045947,...

विमर्श नहीं, विचारधारा : अस्मितावाद की जगह आंबेडकर-चिंतन

बजरंग बिहारी तिवारी बजरंग बिहारी तिवारी हिंदी के प्रसिद्द आलोचक हैं।  दलित मुद्दों पर इनकी प्रतिबद्धता जगजाहिर है और यही इनके आलोचकीय व्यक्तिव की...

ज्यादा अश्लील हैं मर्दों के पहनावे : बुल टीशर्ट यानी अश्लील टीशर्ट!

स्वतंत्र मिश्र स्वतंत्र मिश्र पेशे से पत्रकार हैं ,स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के सम्पादन मंडल के सदस्य भी हैं . इनसे उनके मोबाइल न 9953404777...

दिल्ली में नाइजीरियन यौन- दासियाँ

OLUTOSIN OLADOSU ADEBOWALE OLUTOSIN OLADOSU ADEBOWALE  स्त्री अधिकार कार्यकर्ता हैं, नागारिक पत्रकार हैं. वे बच्चों पर यौन हिंसा के खिलाफ काम करती हैं...

थेरीगाथा , बौद्ध धर्म और स्त्रियाँ

रजनीश कुमार रजनीश कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में बौद्ध अध्ययन विभाग में शोधरत हैं. रजनीश से इनके मोबाइल न 09911639095 पर संपर्क किया जा सकता...

मंडल और महिला आरक्षण

वासंती रामन ( इस सरकार में ६ महिला मंत्रियो को विशिष्ट विभागों का पदभार दिया गया है . यह लोकसभा भी महिला सदस्यों के मामले...

बेहाल गाँव, बेहाल बेटियां , गायब पौधे… धरहरा , जहाँ बेटी पैदा होने पर...

 संजीव चंदन         यह गाँव अचानक से देश -विदेश में चर्चित हो गया, जब 2010 में सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने...

प्रसंग : मोदी और दलित

तुलसीराम ( जब द्विज समूह मोदी की सत्ता की आगवानी के लिए पलक –पावडे बिछाये हुए है , तब मोदी को अति पिछडा और चाय वाला गरीब...
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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