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किताबें | स्त्रीकाल

स्त्री मुक्ति के प्रश्न

कर्मानंद आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि . बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929 अन्य अनुशासनों में शोध और अनुसंधान की स्थिति और गति...

भारत के राजनेता: अली अनवर

स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था 'द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ' की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों...

बहुजन परंपरा की ये किताबें पढ़ें

डेस्क  स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था 'द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ' की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों...

दुश्मनी से परे जन की बात: पाकिस्तानी जनांदोलन की किताब

 “पीपल्स  मूवमेंट्स इन पाकिस्तान’” पर एक चर्चा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कांफ्रेंस हॉल में, आठ फरवरी को रखी गई. पुस्तक पाकिस्तान के जाने माने...

ये किताबें शर्तिया नुस्खा हैं लड़कों/ मर्दों के बदलने के

मनीषा कुमारी सबलोग के ताजे अंक में  स्त्रीकाल कॉलम के तहत प्रकाशित  आधी आबादी के साथ पुरुषों जैसा बराबरी का सुलूक नहीं होता है . रीति-...

मनुस्मृतिः जेंडर हिंसा का कानूनी ग्रंथ

सर्वेश पांडेय सर्वेश पांडेय ने स्त्री अध्ययन में शोध किया है , अभी महिला आयोग में कार्यरत हैं . संपर्क : मोबाइल न.- 08756754651 भारतीय...

बाबा साहेब डा. अम्बेडकर की पत्नी (माई साहेब) को बदनाम किया नेताओं ने:रामदास आठवले

केन्द्रीय सामाजिक  न्याय और अधिकारिता मंत्री  (राज्य) रामदास आठवले ने कहा कि "नेताओं ने जानबूझ कर माई साहब को बदनाम करने की कोशिश की.  बाबा साहब...

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रन्थावली

डेस्क  स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था 'द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ' की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों...

गुजरात दंगों में साहब कौन थे और क्या कर रहे थे बताने वाली किताब...

राजीव सुमन  राणा अयूब की यह किताब  गुजरात दंगे की भीतरी परत के पीछे के सच को नंगा करती है एकदम जासूसी उपन्यास के अंदाज़...

दलित स्त्रियाँ खुद लिखेंगी अपना इतिहास

हेमलता हेमलता ने 'दलित अस्मिता और शिक्षा' पर शोध किया है.सम्पर्क :hmdehrwal@gmail.com अनिता भारती आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। अपने तीखे और सटीक शब्दों...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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