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किताबें | स्त्रीकाल

‘दलित’ शब्द दलित पैंथर आंदोलन के इतिहास से जुड़ा है: रामदास आठवले

'दलित' शब्द पर प्रतिबंध के खिलाफ सरकार के मंत्री आठवले  केरल सरकार ने दलित और हरिजन शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. सरकार...

पढ़ें जगरनॉट एप पर हिन्दी की बेहतरीन किताबें

 पूजा मेहरोत्रा जगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड अपने हिंदी पाठकों के और करीब पहुंच गया है। उसने अपने पाठकों को जगरनॉट हिंदी एप की सौगात दी...

इसलामपुर की शिक्षा-ज्योति कुन्ती देवी

यह पुस्तक बिहार की उस स्त्री की कथा है, जिसके भीतर समाज को बदलने की ख्वाब पलते थे. जो कभी स्त्रियों को अनपढ़ नहीं देखना चाहती थीं. जिनके भीतर आजादी के पूर्व ही आजादख्याली बसती थी. जिन्होंने अपने कर्म से पूरे इसलामपुर को न सिर्फ प्रभावित कीं, बल्कि पूरे बिहार व स्त्रियों के लिए सावित्रीबाई फुले की तरह प्रेरणा की स्रोत बन गईं!

और शहर का किताब हो जाना इश्क़ में…

सुजाता तेवतिया सुजाता तेवतिया चोखेरवाली ब्लॉग का संचालन करती हैं और दिल्ली वि वि के श्यामलाल कॉलेज में पढ़ाती हैं . संपर्क :...

महिलाओं को संसद में होना ही चाहिए : वेंकैया नायडू

नवल कुमार उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने  को कहा कि महिलाओं को अवसर दीजिये और देखिये कि वे किस तरह खुद को साबित करती हैं. वे...

‘दलित साहित्य : एक अन्तर्यात्रा’

अनुपम सिंह अनुपम सिंह दिल्ली वि वि में शोधरत हैं. संपर्क :anupamdu131@gmail.com बजरंग बिहारी तिवारी की पुस्तक ‘दलित साहित्य : एक अन्तर्यात्रा’ का 13 ॰09...

प्रसाद काव्य-कोश

डेस्क  स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था 'द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ' की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों...

प्रत्यक्ष प्रमाण से आगे और सूक्ष्म संवेदना की कविताएं : अभी मैंने देखा

सुनीता गुप्ता अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित ‘अभी मैंने देखा’ शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का संकलन है, जिसका प्रकाशन इसी वर्ष हुआ है। फिल्म तथा प्रयोगात्मक...

सामाजिक क्रांति के लिए आवश्यक सावित्रीबाई फुले के महत्वपूर्ण दस्तावेज

विद्याभूषण रावत  सावित्री बाई जोतिबा  फुले भारतीय इतिहास में सर्वोत्तम युगल के तौर पर कहे जा सकते है. भारतीय समाज में यदि फुले दम्पति के...

दलित स्त्रियाँ खुद लिखेंगी अपना इतिहास

हेमलता हेमलता ने 'दलित अस्मिता और शिक्षा' पर शोध किया है.सम्पर्क :hmdehrwal@gmail.com अनिता भारती आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। अपने तीखे और सटीक शब्दों...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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