‘दलित साहित्य : एक अन्तर्यात्रा’

अनुपम सिंह अनुपम सिंह दिल्ली वि वि में शोधरत हैं. संपर्क :anupamdu131@gmail.com बजरंग बिहारी तिवारी की पुस्तक ‘दलित साहित्य : एक अन्तर्यात्रा’ का 13 ॰09...

सामाजिक क्रांति के लिए आवश्यक सावित्रीबाई फुले के महत्वपूर्ण दस्तावेज

विद्याभूषण रावत  सावित्री बाई जोतिबा  फुले भारतीय इतिहास में सर्वोत्तम युगल के तौर पर कहे जा सकते है. भारतीय समाज में यदि फुले दम्पति के...

एक नई ‘दस्तक’

 अनंत विजय पालीवाल  ( अरुण कुमार प्रियम की सद्य प्रकाशित पुस्तक ' पितृसत्ता और साहित्'  की समीक्षा कर रहे हैं डा. आम्बॆडकर विश्वविद्यालय के शोधार्थी...

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रन्थावली

डेस्क  स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था 'द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ' की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों...

स्त्री मुक्ति के प्रश्न

कर्मानंद आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि . बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929 अन्य अनुशासनों में शोध और अनुसंधान की स्थिति और गति...

मैंने अमित शाह को गुंडा (इसलिए) कहा…..राना अय्यूब

मुकुल सरल   “ये किताब एंटी मोदी या एंटी अमित शाह नहीं है, ये किताब उन लोगों के लिए जस्टिस की किताब है। हम आपको सिर्फ...

ऑब्जेक्ट से सब्जेक्ट बनने की जद्दोजहद

सुधा उपाध्याय जानकीदेवी मेमोरियल कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं संपर्क:ईमेल:sudhaupadhyaya@gmail.com हमने जो तर्ज़े-फुगाँ की थी कफ़स में ईजाद फैज़ गुलशन में वही तर्ज़े-बयाँ ठहरी है….(फैज़अहमदफैज़) क्या...

बाबा साहेब डा. अम्बेडकर की पत्नी (माई साहेब) को बदनाम किया नेताओं ने:रामदास आठवले

केन्द्रीय सामाजिक  न्याय और अधिकारिता मंत्री  (राज्य) रामदास आठवले ने कहा कि "नेताओं ने जानबूझ कर माई साहब को बदनाम करने की कोशिश की.  बाबा साहब...

ये किताबें शर्तिया नुस्खा हैं लड़कों/ मर्दों के बदलने के

मनीषा कुमारी सबलोग के ताजे अंक में  स्त्रीकाल कॉलम के तहत प्रकाशित  आधी आबादी के साथ पुरुषों जैसा बराबरी का सुलूक नहीं होता है . रीति-...

हिंदी उपन्यास और थर्ड जेंडर

भावना मासीवाल भावना मासीवाल महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं.   संपर्क :bhawnasakura@gmail.com; हमारा पूरा समाज दो स्तम्भों पर खड़ा है...
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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