‘दलित’ शब्द दलित पैंथर आंदोलन के इतिहास से जुड़ा है: रामदास आठवले

'दलित' शब्द पर प्रतिबंध के खिलाफ सरकार के मंत्री आठवले  केरल सरकार ने दलित और हरिजन शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. सरकार...

प्रसाद काव्य-कोश

डेस्क  स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था 'द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ' की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों...

महिलाओं को संसद में होना ही चाहिए : वेंकैया नायडू

नवल कुमार उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने  को कहा कि महिलाओं को अवसर दीजिये और देखिये कि वे किस तरह खुद को साबित करती हैं. वे...

“आम औरत की दैहिक या मानसिक यातना के लिए दहकते सवाल“

नीलम कुलश्रेष्ठ जिंदगी की तनी डोर, ये स्त्रियाँ, परत दर परत स्त्री सहित कई किताबें प्रकाशित हैं. सम्पर्क:  .kneeli@rediffmail.com,  आदरणीय सुधा अरोडा जी की पुस्तक मंगाने से...

पढ़ें जगरनॉट एप पर हिन्दी की बेहतरीन किताबें

 पूजा मेहरोत्रा जगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड अपने हिंदी पाठकों के और करीब पहुंच गया है। उसने अपने पाठकों को जगरनॉट हिंदी एप की सौगात दी...

महिषासुर: मिथक व परम्पराएं

डेस्क  स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था 'द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ' की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों...

आपहुदरी का लोकार्पण

हिन्दी की प्रसिद्ध लेखिका रमणिका गुप्ता की आत्मकथा का दूसरा खंड ‘आपहुदरी’ का आज शाम 5.30 बजे साहित्य अकादेमी के सभागार में लोकार्पण किया...

ऑब्जेक्ट से सब्जेक्ट बनने की जद्दोजहद

सुधा उपाध्याय जानकीदेवी मेमोरियल कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं संपर्क:ईमेल:sudhaupadhyaya@gmail.com हमने जो तर्ज़े-फुगाँ की थी कफ़स में ईजाद फैज़ गुलशन में वही तर्ज़े-बयाँ ठहरी है….(फैज़अहमदफैज़) क्या...

और शहर का किताब हो जाना इश्क़ में…

सुजाता तेवतिया सुजाता तेवतिया चोखेरवाली ब्लॉग का संचालन करती हैं और दिल्ली वि वि के श्यामलाल कॉलेज में पढ़ाती हैं . संपर्क :...

प्रत्यक्ष प्रमाण से आगे और सूक्ष्म संवेदना की कविताएं : अभी मैंने देखा

सुनीता गुप्ता अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित ‘अभी मैंने देखा’ शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का संकलन है, जिसका प्रकाशन इसी वर्ष हुआ है। फिल्म तथा प्रयोगात्मक...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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