बाबा साहेब डा. अम्बेडकर की पत्नी (माई साहेब) को बदनाम किया नेताओं ने:रामदास आठवले

केन्द्रीय सामाजिक  न्याय और अधिकारिता मंत्री  (राज्य) रामदास आठवले ने कहा कि "नेताओं ने जानबूझ कर माई साहब को बदनाम करने की कोशिश की.  बाबा साहब...

स्त्रीवाद की ` रिले रेस `में रमणिका गुप्ता का बेटन

नीलम कुलश्रेष्ठ जिंदगी की तनी डोर, ये स्त्रियाँ, परत दर परत स्त्री सहित कई किताबें प्रकाशित हैं. सम्पर्क:  .kneeli@rediffmail.com, स्त्रियों की जागृति  का इतिहास सवा सौ साल...

स्त्रीकाल शोध जर्नल अंक (31)

इस अंक के लेखक: पूजा तिवारी, गंगा सहाय मीणा, डॉ. अनीता शुक्ल, महमुदा खानम, डॉ. अखिलेश गुप्ता, सुशील कुमार, स्वाति चौधरी, कंचन...

प्रसाद काव्य-कोश

डेस्क  स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था 'द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ' की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों...

प्रत्यक्ष प्रमाण से आगे और सूक्ष्म संवेदना की कविताएं : अभी मैंने देखा

सुनीता गुप्ता अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित ‘अभी मैंने देखा’ शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का संकलन है, जिसका प्रकाशन इसी वर्ष हुआ है। फिल्म तथा प्रयोगात्मक...

दलित स्त्रियाँ खुद लिखेंगी अपना इतिहास

हेमलता हेमलता ने 'दलित अस्मिता और शिक्षा' पर शोध किया है.सम्पर्क :hmdehrwal@gmail.com अनिता भारती आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। अपने तीखे और सटीक शब्दों...

मैंने अमित शाह को गुंडा (इसलिए) कहा…..राना अय्यूब

मुकुल सरल   “ये किताब एंटी मोदी या एंटी अमित शाह नहीं है, ये किताब उन लोगों के लिए जस्टिस की किताब है। हम आपको सिर्फ...

गुजरात दंगों में साहब कौन थे और क्या कर रहे थे बताने वाली किताब...

राजीव सुमन  राणा अयूब की यह किताब  गुजरात दंगे की भीतरी परत के पीछे के सच को नंगा करती है एकदम जासूसी उपन्यास के अंदाज़...

स्त्रीकाल : स्त्रीवादी चिंतन का आर्काइव

नूतन यादव नूतन यादव दिल्ली विश्वविद्यालय  में पढ़ा रही  हैं. फेसबुक पर सक्रीय स्त्रीवादी टिप्पणीकार हैं. संपर्क  :09810962991  ( स्त्रीकाल , स्त्री का समय...

जहां ईश्वर है और अन्य कविताएं (वीरू सोनकर)

वीरू सोनकर कविता एवं कहानी लेखन, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं व ब्लाग्स पर रचनाएं प्रकाशित . संपर्क :veeru_sonker@yahoo.com, 7275302077 जहाँ ईश्वर है  प्रार्थना के पीछे पहले...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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