क्या फिल्म-कलाकारों के भरोसे ही चुनाव जीता जायेगा!

मैं पश्चिम बंगाल से हूं तो मैं बात भी उसकी ही करुंगी. लोकसभा चुनाव में दीदी को तो लगता है कि कलाकारों को अलावा कोई नजर नहीं आया. इस बार दीदी की पार्टी से आसनसोल से एक्ट्रेस मुनमुन सेन, पश्चिमी मेदिनीपुर से दीपक घोष जो कि ‘देव’ नाम से प्रसिद्ध है और बसीरहाट से बंगाली एक्ट्रेस से नसीर जहां को टिकट दिया गया है. व

बेगूसराय में मार्क्सवाद का अस्थि-पंजर:कन्हैया सिंड्रोम

देश के तथाकथित उदारवादियों ने इसे प्रचारित किया कि कन्हैया देश में एक नयी राजनीति गढ़ रहा है। यह न केवल देश के राजनीतिक इतिहास के साथ धोखागढ़ी थी बल्कि उन हजारों लोगों की यातनाओं और कुर्बानियों का भी अपमान था जिन्होंने अपने संघर्षों से उन नारों को गढ़ा था। आजादी का नारा जहां दश कों में कश्मीरियों के संघर्षों का एक गान बन गया था वहीं जय भीम-लाल सलाम का नारा 1970 के दश क में महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में दलित पैंथर के लोगों नें अपने संघर्षों की राजनीति से गढ़ा था।

सीपीआई-विधायक दल के पूर्व नेता ने पार्टी को कहा था लालू प्रसाद का...

इसी तरह से सोनबरसा (सहरसा जिला) में जहाँ हमारी पार्टी के एक उम्मीदवार खड़े हो गए थे जिन्हें पार्टी समझाने-बुझाने में लगी हुई थी, के विषय में वहां की एक रैली में लालूजी ने कहा ‘‘आज शाम तक इस उम्मीदवार को सीपीआई से निकाल दिया जाएगा।’’

लूला से लालू तक: क्या बिहार और ब्राजील का एक ही पैमाना है!

लालू प्रसाद और लूला दा सिल्वा के खिलाफ कानूनी मामले और फिर उन्हें दी गयी जेल इस बात के उदाहरण हैं कि दक्षिणपंथी ताकतें भ्रष्टाचार के मुद्दे का सेंटर-लेफ्ट के लोकप्रिय राजनीतिक संरचनाओं के खिलाफ एक हथियार के रूप में कैसे इस्तेमाल करती हैं। कोई यह नहीं कह रहा है कि लालू के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) या लूला के पार्टिडो डॉस ट्रबलहैडोर्स (वर्कर्स पार्टी या पी टी) नस्ल/जाति-वर्ग संबंधों के सामाजिक परिवर्तन का प्रयास कर रहे थे।

बिहार- सियासत और लेनिनग्राद का मिथ

जैसे ही पता चला कि महागठबंधन में उनको जगह नहीं मिली, भाकपा तथा अन्य वामपंथियों के रंगरूटों ने मीडिया पोर्टल, सोशल मीडिया, तथा कई यू-ट्यूब चैनलों पर लालू प्रसाद तथा राजद के खिलाफ लिखने लगे। अब राजद फिर से घोर जातिवादी हो गयी। लालू प्रसाद तथा उनके पूरे परिवार को तथाकथित चारा चोर और भ्रष्टाचारी के विशेषणों से नवाजा जाने लगा।

एक बहुजन नेत्री की संभावनाएं : मनीषा बांगर

इर्शादुल हक़ मायावती को कांशी राम ने अवसर दिया तो उन्होंने अपनी लीडरशिप साबित करके दिखाई. वह...

मध्यवर्गीय जीवन से संसद की यात्रा तक: भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री रीता वर्मा

राजनीति के क्षेत्र में आने के बाद कई तरह के विचार मुझे कौंधते रहे। संसद का समाजशास्त्र क्या है, संसद में, सेंट्रल कक्ष में समितियों में और गलियारों में। क्या पुरुष महिला सांसदों को महिला के रूप में ही देखते हैं या सांसद के तौर पर। प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। सार्वजनिक जीवन पुरुषों की दुनिया है, इसके साथ हमें विवाह करना होता है। एक पारदर्शी स्पेस और संसदीय एजेण्डे में समान भागीदारी आज की एक चुनौती है।

संसद के वे दिन: जब मैं झांसी से चुनकर आयी

एस्टीमेट कमेटी और पब्लिक अकाउन्ट कमिटी, यह दो महत्वपूर्ण सांसदीय समितियां थीं जो अध्यक्ष सदस्यों के सरकारी व्ययों पर देखरेख करने का अधिकार देती थीं। उन दिनों में कोई भी व्यक्ति गलत सूचना देने का ख्वाब भी नहीं देख पाता था। समिति के दौरे बहुत ही शैक्षणिक होते थे। हम राजस्थान के दौरे पर गए थे। हम ट्रेन में ही रहे जो हमें जगह-जगह ले जाती थी हमारा खाने-सोने की व्यवस्था सभी ट्रेन में ही थी। यह यात्रा काफी मजेदार रही।

पिछले पांच सालों में महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़े है: महाराष्ट्र महिला कांग्रेस अध्यक्ष

जब मैंने राजनीति की शुरुआत की, मैं कॉलेज से पढ़ कर निकली ही थी। मुझे इसका अनुभव बिल्कुल भी नहीं था। मेरी राजनीति की शुरुआत 1992 में जिला परिषद के चुनाव से जिला परिषद के अध्यक्ष के रूप में हुई। 5 साल तक मैं जिला परिषद में थी उसके बाद पार्टी में कई पदों पर रही।

जाने क्या कुछ है महिलाओं के लिए कांग्रेस के पिटारे में: कांग्रेस का घोषणापत्र

समाज के श्रमशील वर्ग की महिलाओं के लिए भी महत्वपूर्ण घोषणा है जिसमे प्रवासी महिला श्रमिकों के लिए पर्याप्त रैन बसेरों, कसबों और शहरों में महिलाओं के लिए स्वच्छ एवं सुरक्षित शौचालयों की संख्या बढ़ाने, सार्वजनिक स्थलों, स्कूलों और कॉलेजों में सेनेटरी नेपकिन वेंडिंग मशीने लगाने की बात है.
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