जाने क्या कुछ है महिलाओं के लिए कांग्रेस के पिटारे में: कांग्रेस का घोषणापत्र

समाज के श्रमशील वर्ग की महिलाओं के लिए भी महत्वपूर्ण घोषणा है जिसमे प्रवासी महिला श्रमिकों के लिए पर्याप्त रैन बसेरों, कसबों और शहरों में महिलाओं के लिए स्वच्छ एवं सुरक्षित शौचालयों की संख्या बढ़ाने, सार्वजनिक स्थलों, स्कूलों और कॉलेजों में सेनेटरी नेपकिन वेंडिंग मशीने लगाने की बात है.

क्या फिल्म-कलाकारों के भरोसे ही चुनाव जीता जायेगा!

मैं पश्चिम बंगाल से हूं तो मैं बात भी उसकी ही करुंगी. लोकसभा चुनाव में दीदी को तो लगता है कि कलाकारों को अलावा कोई नजर नहीं आया. इस बार दीदी की पार्टी से आसनसोल से एक्ट्रेस मुनमुन सेन, पश्चिमी मेदिनीपुर से दीपक घोष जो कि ‘देव’ नाम से प्रसिद्ध है और बसीरहाट से बंगाली एक्ट्रेस से नसीर जहां को टिकट दिया गया है. व

भारतीय वामपंथियों का ‘कन्हैया सिन्ड्रोम.’!

बहरहाल, ये सवाल बाद के हैं। फिलहाल सबसे पहले यही देखने की जरूरत है कि जिस कन्हैया और बेगूसराय की सीट के जरिए भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां और उनसे जुड़े लोग या उनके समर्थक सीधे क्रांति का हो जाना घोषित कर रहे हैं, क्या वहां कन्हैया का दावा बन रहा है?

एक बहुजन नेत्री की संभावनाएं : मनीषा बांगर

इर्शादुल हक़ मायावती को कांशी राम ने अवसर दिया तो उन्होंने अपनी लीडरशिप साबित करके दिखाई. वह...

बेगूसराय की बिसात पर किसकी होगी शह और किसकी होगी मात?

वहाँ यह बात स्पष्ट हो गयी थी कि भूमिहार मतदाता ने अपना मत तय कर लिया है और उनका वोट थोक में भाजपा के उम्मीदवार गिरिराज सिंह को मिलेगा। मेरे इस आकलन को और भी मजबूत पुष्टि मिली जब अगली सुबह मैं गिरिराज सिंह के रोड शो को सिमरिया घाट से विभिन्न इलाकों में फॉलो कर रहा था। सिमरिया में हर 10 घर में से 8 घरों की मुंडेर पर भाजपा के बड़े - बड़े झंडे लहरा रहे थे।

महिला विरोधी बयान और मर्दवादी राजनीति

ये कहना गलत नहीं होगा क़ि पिछले पांच साल में शीर्ष से "मिसोजिनि" या स्त्री विरोधी संस्कृति मुख्यधारा का स्वीकृत हिस्सा बन चुकी है, मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा किसी और प्रधानमंत्री की ऐसी जबान कभी नहीं थी जब विपक्ष की सबसे बड़ी नेता जो महिला हैं उनका जिक्र तमाम मंचों से उन्होंने शालीनता की हद से बाहर जाकर किया

फासीवाद की ओट में जातिवाद में गर्क होता लेनिनग्राद

इन प्रवृतियों के पीछे दरअसल एक जातिवादी अपर कास्ट उतेजना काम कर रही है, जो ‘जय भीम, साल सलाम, और सामंतवाद से आजादी’ के स्लोगन के रूप में इतेफाकन दिल्ली से शुरू हुई थी और जल्द ही वामपंथ के बेगूसराय मॉडल में फिट होती हुई संघी भोला सिंह के माल्यार्पण तक आकर खत्म हो गई। लेकिन हिन्दी की एकेडमिया,मीडिया इसे अभी भी जीवित रखना चाहती है ताकि सामाजिक न्याय को उसकी पटरी से उतारकर वहां एक नए किस्म का ब्राहणवाद को स्थापित किया जा सके। यहां अंतर बस इतना ही है कि इस बार वह भाजपा के उग्र राष्ट्रवाद के रूप में नहीं, अपितु उसके काउंटर पार्ट के रूप में खुद को स्थापित करने की अपनी अंतिम लड़ाई की आजमाईश कर रही है।

चुनाव आयोग से महिला संगठनों ने जेंडर आधारित टिप्पणियों पर की कार्रवाई की मांग

हम सभी राजनीतिक पार्टी के अध्यक्षों से अनुरोध करते हैं कि वे अपने उम्मीदवारों को अपने भाषणों और सभाओं में ऐसी असंसदीय भाषा का उपयोग करने से परहेज करने की सलाह दें। अपने विरोधियों की माँ को गालियाँ उम्मीदवार, पार्टी की छवि के खिलाफ तो है ही वे हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए एक बहुत बुरा उदाहरण पेश करती हैं।

पिछले पांच सालों में महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़े है: महाराष्ट्र महिला कांग्रेस अध्यक्ष

जब मैंने राजनीति की शुरुआत की, मैं कॉलेज से पढ़ कर निकली ही थी। मुझे इसका अनुभव बिल्कुल भी नहीं था। मेरी राजनीति की शुरुआत 1992 में जिला परिषद के चुनाव से जिला परिषद के अध्यक्ष के रूप में हुई। 5 साल तक मैं जिला परिषद में थी उसके बाद पार्टी में कई पदों पर रही।

लूला से लालू तक: क्या बिहार और ब्राजील का एक ही पैमाना है!

लालू प्रसाद और लूला दा सिल्वा के खिलाफ कानूनी मामले और फिर उन्हें दी गयी जेल इस बात के उदाहरण हैं कि दक्षिणपंथी ताकतें भ्रष्टाचार के मुद्दे का सेंटर-लेफ्ट के लोकप्रिय राजनीतिक संरचनाओं के खिलाफ एक हथियार के रूप में कैसे इस्तेमाल करती हैं। कोई यह नहीं कह रहा है कि लालू के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) या लूला के पार्टिडो डॉस ट्रबलहैडोर्स (वर्कर्स पार्टी या पी टी) नस्ल/जाति-वर्ग संबंधों के सामाजिक परिवर्तन का प्रयास कर रहे थे।
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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