गिरीश कर्नाड और उनकी इलाहाबादी बेटी

मेरी उम्र बहुत कम थी, मैं बेसब्री से फौरन उनके पास पंहुची और पूछा, "आप वहींं इंटैलीजेंट आदमी हैं ना, जो टर्निंग-पॉइंट में आते हैं... और मालगुड़ी डेज़ में भी.. है ना.."

‘तिवाड़ी परिवार’ में जातिभेद और छुआछूत बचपन से देखा

हमारी संस्था ने इसी समाज की बालिकाओं के छह – छह महीने के दो आवासीय शिविर किए. शिविर के समापन समारोह में प्रोफेसर श्यामलाल जैदिया को भी आमंत्रित किया. उन्होंने अपने उद्बोधन में बताया कि मैं भी आपके ही समाज से हूँ लेकिन मेहनत करके आज जोधपुर यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर पद से रिटायर हुआ हूँ. बचपन में मैं इसी यूनिवर्सिटी में मेरी माँ के साथ मैला ढोने (शौचालय साफ़ करने) जाता था.

ब्राह्मण होने का दंश: कथित पवित्रता की मकड़जाल

शिक्षकों के साथ एससीईआरटी मे विभिन्न प्रशिक्षणों के दौरान काम करते हुए कई बार जाती पूछी गई दक्षिण भारत मे (आंध्र प्रदेश) उस समुदाय या उस क्षेत्र विशेष के लोग ही आपको चिन्हित कर पाते हैं| मैं छत्तीसगढ़ मे रहती हूँ तो जब तक मैं स्वयम से होकर लोगो को अपनी जाति नहीं बताती तब तक पता नही होता| मेरे नाम में मैंने अपना उपनाम कभी नही लिखा संयोग से विद्यालय मे भी मेरा केवल नाम ही रह गया उपनाम किसी तरह से छूट गया|

ऑर्गेज़्मिक पैरिटी की चैरिटी बनाम ‘योनि उद्धारक’ बाजार

हम ड्यूरेक्स वालों का नहीं तो कम से कम अपनी प्यारी सिने तारिकाओं के आह्वान का तो यकीन करो । वो क्या है न कि हुआ ये कि मुल्क की औरतों के शोचनीय कामानुभवों की बात हम क़ंडोम कर्ता लोग से लीक होकर आगे को गई। आगे को गई तो सिने तारिका लोग फीलिंग कंसर्ण्ड हुईं ।

मेट्रो-किराया-माफ़: मोवलिटी और सुरक्षा की ओर एक कदम

इस तरह स्त्री सुरक्षा समाज के कई स्तरों और जीवन की कई परतों में फैला एक जटिल मामला है, एक सुरक्षित समाज बनाने के लिये समाज मे न जाने कितने बदलावों और उपायों की ज़रूरत है. स्त्रियों की दुकानों, दफ्तरों, स्कूल, कॉलेजों, सड़को, सिनेमाघरों, रेस्टोरेंट में बढ़ी हुई उपस्थिति एक ऐसा ही उपाय है जो असुरक्षा की भावना को कम कर सकता है.

उस संस्थान में ब्राह्मणों की अहमियत थी

कुछ बड़ी कक्षाओं में जब स्कूल के फॉर्म हम खुद भरने लगे तो जाति का सर्टिफिकेट लगाने की बात आई और मुझे वह सर्टिफिकेट नहीं लगाना था, तब पता चला कि अच्छा यह कुछ 'खास जातियों'के लिए ही लगता है, लेकिन तब भी मन में किसी तरह का और कोई भाव नहीं था, वह एक दिन होता था जब फॉर्म भरे जाते और अपनी-अपनी जातियाँ लिखी जाती थीं, तमाम दूसरी औपचारिकताओं की तरह। लेकिन तब ये जरूर लगता कि फॉर्म में ये कॉलम नहीं होना चाहिए…न ये कॉलम होता न हमें हमारी जातियाँ पता चलतीं।

हां उनकी नजर में जाति-घृणा थी, वे मेरे दोस्त थे, सहेलियां थीं

हिंदू ग्रंथों, टेलीविजन, सहित, समाज विज्ञान, सिनेमा ने अबतक आदिवासी को नकारात्मक तौर से पेश किया है. एंथ्रोपोलॉजी और सोशियोलॉजी के विद्वानों ने भी आदिवासियों का स्ट्रियोटाइप गढ़ने में बड़ा रोल अदा किया है.इसी स्टरियोटाइप से ग्रसित ही कर मेरे कॉलेज के दोस्तों ने मेरे साथ टिफिन खाना बंद कर दिया.

केरल के सभी स्कूलों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाना अनिवार्य:देश में पहली बार

79 फीसदी छात्राओं ने माना कि वे मासिक धर्म के दौरान स्कूल जाना या घर से बाहर निकलना पंसद नहीं करतीं. 45 फीसदी छात्राएँ मासिकधर्म के दौरान योग और खेलकूद नहीं करती जबकि 41 फीसदी ऐसा करती हैं. 28 फीसदी कभी कर लेती हैं कभी नहीं करती. इसी तरह 63.5 फीसदी छात्राओं ने बताया कि उन्हें महिला प्रजनन प्रणाली के बारे में जानकारी है जबकि 86.5प्रतिशत छात्राओं को पुरुष प्रजनन प्रणाली की जानकारी नहीं थी.

वे सब ऊंची जाति की हिन्दू सहेलियां थीं: मेरे मुसलमान होने की पीड़ा

ऐसा मौका कई बार आया जब मेरी एक अन्य सहकर्मी (ब्राहमण) साथ खाना खाने से कतराती रहती थी, कभी खा भी लेती तो मेरे डब्बे से एक निवाला भी न चखती। ये सिलसिला लम्बा चलता रहा। कष्ट किसी को नही था इस बात से, सिवाय मेरे। वक्त गुज़रता गया। दिल की बात जुबान तक आने में ज्यादा वक्त नही लगा। एक दिन उसने कहा गुरूदेव कहते हैं, जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन….। गायत्री परिवार के श्रीराम शर्मा की भक्ति के शब्द थे ये।

सांस्थानिक हत्या की सनातन परम्परा: शंबूक से लेकर डा.पायल तक

वहॉं से तो तथाकथित सभ्य समाज तक की यात्रा और भी कठिन, दुरुह रही होगी। मेडिकल कॉलेज में सामान्य कॉलेज की तरह आपके पास अपनी जाति को छुपाने का कोई रास्ता नहीं होता। यहॉं जातियॉं जग - ज़ाहिर होती हैं। और इलीट वर्ग के हाथों में जैसे हथियार आ जाता है। इनकी ज़ुबान फ़ोरसिप (सडसी/चिमटा) की तरह हो जाती हैं।
245FollowersFollow
529SubscribersSubscribe

लोकप्रिय

Loading...