बंगाल का काला जादू नहीं, यह जादू सियासत का है: सुशांत प्रकरण

प्रेमकुमार मणि जहाँ लाखों  लोग महामारी से उत्पीड़ित हो रहे हों, हजारों मर रहे हों, और सरकारें विवश -लाचार दिख रही हों, वहाँ एक अभिनेता...

बेटियों के हक का फैसला

दीप्ति शर्मा  बेटियों के अधिकार की बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है जिसमे जन्म से ही बेटियाँ होंगी पिता की...

चार करोड़ की फेलोशिप पाने वाली बेटी सुदीक्षा को मर्दवाद ने मार दिया

सुदीक्षा भाटी ने 5वीं तक की पढ़ाई डेरी स्कैनर गांव के प्राइमरी स्कूल से की थी वह गरीब परिवार की होनहार बेटी थी, उसने...

अलविदा ‘इलीना सेन’

'संजीव चंदन' इलीना (मैडम) सेन क्या भूलूँ क्या याद करूं ...! इलीना मैडम चाहता हूँ कि आपको अपने स्वर्णिम यादों में याद रखूं, याद रखूं कि...

नबनीता देव सेन की कविताएं

7 नवंबर 2019 को कैंसर की वजह से नबनीता देव सेन नहीं रहीं. बंगाल की कवयित्री, गीतकार, व्यंग्य लेखिका राधारानी देबी की बेटी पद्मश्री...

प्यार से आपलोग किन्नर बुलायें तो अच्छा लगेगा

जब मैं 12 या 13 साल की हुई तो मुझे लड़का-लड़की से अलग महसूस होने लगा था. वैसे तो मैं बचपन से ही लड़कियों के साथ गुड्डा–गुड्डी, भांडी–भांडी,रस्सी उड़ी, खो-खो खेलती थी. जब मैं 13 साल की हो गई तब मेरा लड़कों की ओर आकर्षण और बढ़ने लगा. तब मुझे महसूस हुआ कि मैं लड़का-लड़की से अलग हूँ.

अपनी वैचारिकी को समसामयिक आंदोलनों से जोड़ने को तत्पर दिखे लेखक संगठन

आशुतोष कुमार, ‘ अब हमारे लेखकों पहचान बदली जा रही है| चाहे सूरदास हों , निराला हों, उनसब को ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ सिद्ध किया जा रहा है|’ उन्होंने आन्दोलन को आंबेडकरी बनाने और आंबेडकर (विचार) को रेडिकल बनाने की आवश्यकता बताई| धीरेन्द्र नाथ के पर्चे का वाचन संजीव कुमार ने किया| धीरेन्द्र ने उन स्रोतों की तरफ फिर से जाने की बात की जिन्हें हम अति प्रगतिशीलता के दबाव में अनदेखा करते आए हैं|

एपवा ने योगी सरकार के खिलाफ राज्यपाल को सौंपा ज्ञापन

(एपवा) ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को प्रदेश में महिलाओं , बच्चियों , दलितों , आदिवासियों व अल्पसंख्यकों पर हिंसा और भीड़ द्वारा बढती हिंसात्मक घटनाओं को लेकर जिलाधिकारी के माध्यम से ज्ञापन सौंपा. एपवा ने आरोप लगाया कि इन घटनाओं को रोकने में योगी सरकार नाकाम ही नहीं हो रही है बल्कि जो भी लोग इन घटनाओं के खिलाफ बोल रहे है उनके साथ तानाशाही भरा रवैया अपनाते हुए उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है. एपवा ने मांग किया कि बढ़ते दमन और हिंसा की घटनाओं पर तत्काल रोक लगाई जाय. ऐपवा ने पूरे उत्तर प्रदेश में 20 अगस्त को इन मुद्दों पर एक साथ विरोध प्रदर्शन किया.

बीबीसी में जातिगत भेदभाव (आरोप)

"आप ही मीना हो?" "हां, क्यों क्या हुआ?" "नहीं कुछ नहीं, बस ऐसे ही." "आपने इस तरह अचानक पूछा..? आप बताइए न किसी ने कुछ कहा क्या?" "नहीं, नहीं कुछ ख़ास नहीं." (थोड़ी देर बात कर उन्हें विश्वास में लेने के बाद) "बताइए न मैं किसी को नहीं बताऊंगी." "मुझसे किसी ने कहा था कि अब तो आपके लोग भी हमारे साथ बैठ कर काम करेंगे." ----------------------- यह सुन मैं थोड़ी देर शांत बैठ गई. मैंने उनसे जब पूछा कि आपको ये किसने कहा तो उन्होंने बताने से मना कर दिया. बीबीसी में मेरी नौकरी करने के ऊपर की गई यह टिप्पणी किसने बताई, मैं उनका नाम जगजाहिर नहीं करना चाहती क्योंकि मैं नहीं चाहती मेरी वज़ह से किसी की नौकरी ख़तरे में पड़ जाए. लेकिन बताना चाहूंगी वो व्यक्ति दलित समुदाय से आते हैं और वे पत्रकार नहीं हैं. वो बीबीसी के दफ़्तर में एक साधारण कर्मी हैं.

आरएसएस की विचारधारा विभाजनकारी और फासीवादी: डी. राजा

यह सिर्फ वाम के लिए चुनौतीपूर्ण समय नहीं है, अपितु यह लोगों के लिए और संपूर्ण देश के लिए ही चुनौतीपूर्ण है क्‍योंकि दक्षिणपंथी ताकतों ने राजनीतिक सत्‍ता हथिया ली है। भाजपा उस आरएसएस की राजनीतिक भुजा है जिसकी विचारधारा विभाजनकारी, सांप्रदायिक, कट्टरतावादी और फासीवादी है। वे अपने कार्यक्रम को आक्रमणकारी ढंग से लादने की कोशिश करते हैं। यह संविधान और देश की लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था के लिए एक खतरा पेश करता है। इसका लक्ष्‍य है - दलितों, आदिवासियों और अल्‍पसंख्‍यकों पर होने वाली भीड़ की हिंसा और हमलों को बढ़ावा देना। अगर कोई सरकार पर सवाल उठाता है या इसकी नीतियों की आलोचना करता है तो उस पर राष्‍ट्र विरोधी और अर्बन नक्‍सली होने का ठप्‍पा लगा दिया जाता है।
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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