उस संस्थान में ब्राह्मणों की अहमियत थी

कुछ बड़ी कक्षाओं में जब स्कूल के फॉर्म हम खुद भरने लगे तो जाति का सर्टिफिकेट लगाने की बात आई और मुझे वह सर्टिफिकेट नहीं लगाना था, तब पता चला कि अच्छा यह कुछ 'खास जातियों'के लिए ही लगता है, लेकिन तब भी मन में किसी तरह का और कोई भाव नहीं था, वह एक दिन होता था जब फॉर्म भरे जाते और अपनी-अपनी जातियाँ लिखी जाती थीं, तमाम दूसरी औपचारिकताओं की तरह। लेकिन तब ये जरूर लगता कि फॉर्म में ये कॉलम नहीं होना चाहिए…न ये कॉलम होता न हमें हमारी जातियाँ पता चलतीं।

हां उनकी नजर में जाति-घृणा थी, वे मेरे दोस्त थे, सहेलियां थीं

हिंदू ग्रंथों, टेलीविजन, सहित, समाज विज्ञान, सिनेमा ने अबतक आदिवासी को नकारात्मक तौर से पेश किया है. एंथ्रोपोलॉजी और सोशियोलॉजी के विद्वानों ने भी आदिवासियों का स्ट्रियोटाइप गढ़ने में बड़ा रोल अदा किया है.इसी स्टरियोटाइप से ग्रसित ही कर मेरे कॉलेज के दोस्तों ने मेरे साथ टिफिन खाना बंद कर दिया.

केरल के सभी स्कूलों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाना अनिवार्य:देश में पहली बार

79 फीसदी छात्राओं ने माना कि वे मासिक धर्म के दौरान स्कूल जाना या घर से बाहर निकलना पंसद नहीं करतीं. 45 फीसदी छात्राएँ मासिकधर्म के दौरान योग और खेलकूद नहीं करती जबकि 41 फीसदी ऐसा करती हैं. 28 फीसदी कभी कर लेती हैं कभी नहीं करती. इसी तरह 63.5 फीसदी छात्राओं ने बताया कि उन्हें महिला प्रजनन प्रणाली के बारे में जानकारी है जबकि 86.5प्रतिशत छात्राओं को पुरुष प्रजनन प्रणाली की जानकारी नहीं थी.

वे सब ऊंची जाति की हिन्दू सहेलियां थीं: मेरे मुसलमान होने की पीड़ा

ऐसा मौका कई बार आया जब मेरी एक अन्य सहकर्मी (ब्राहमण) साथ खाना खाने से कतराती रहती थी, कभी खा भी लेती तो मेरे डब्बे से एक निवाला भी न चखती। ये सिलसिला लम्बा चलता रहा। कष्ट किसी को नही था इस बात से, सिवाय मेरे। वक्त गुज़रता गया। दिल की बात जुबान तक आने में ज्यादा वक्त नही लगा। एक दिन उसने कहा गुरूदेव कहते हैं, जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन….। गायत्री परिवार के श्रीराम शर्मा की भक्ति के शब्द थे ये।

सांस्थानिक हत्या की सनातन परम्परा: शंबूक से लेकर डा.पायल तक

वहॉं से तो तथाकथित सभ्य समाज तक की यात्रा और भी कठिन, दुरुह रही होगी। मेडिकल कॉलेज में सामान्य कॉलेज की तरह आपके पास अपनी जाति को छुपाने का कोई रास्ता नहीं होता। यहॉं जातियॉं जग - ज़ाहिर होती हैं। और इलीट वर्ग के हाथों में जैसे हथियार आ जाता है। इनकी ज़ुबान फ़ोरसिप (सडसी/चिमटा) की तरह हो जाती हैं।

महिला राजनेताओं की सेक्सुअल ट्रोलिंग को रोक सकती है राजनीतिक जागरूकता

भारत मे स्त्री मतदाताओ पर किये सर्वे बताते है कि दक्षिण भारत मे स्त्रियाँ स्वैच्छिक मतदान का प्रयोग ज़्यादा करती हैं उत्तर भारत की तुलना मे जहाँ आज भी स्त्रियाँ अपने मत का निर्णय करने के लिये स्वतंत्र नही. आपको जिन मामलों में निर्णय का अधिकार अथवा स्वतंत्रता न हो तो निर्णय करने की क्षमता पर भी इसका सीधा असर पड़ता ही है.

मी लार्ड, यहाँ महिलाओं को न्याय नहीं न्याय का स्वांग मिलता है

फिलहाल, मुख्य न्यायाधीश को क्लीन चिट दिए जाने के फैसले के खिलाफ, आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पूर्व महिला कर्मचारी जल्द ही अदालत में अपील करेगी, मामला क्या रुख लेता है ये तो आनेवाला समय ही बताएगा लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि इस मामले को जिस तरह से निपटाया गया है उससे कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ महिलाओं की इंसाफ की लड़ाई कमजोर हुई है।

बेंगलुरू: धिक्कार है! लड़कियों की संख्या से आपत्ति है!!(लड़कियों के लिए हाई कट ऑफ़...

मतलब यदि लड़कों की संख्या अधिक है तो आपको कोई आपत्ति नहीं है लेकिन यदि लड़कियों की संख्या अधिक होने लगी तो आप परेशान हो गए। जैसा कि पूर्व में कहा कि कुलपति जैसा व्यक्ति यह बयान देता है कि ‘ज्यादा कट ऑफ़ नहीं होगा तो कॉलेज में सिर्फ़ लड़कियाँ होंगी’।

किन्नर से अपने बेटे का विवाह कराने वाली एक दिलेर माँ की कहानी, उसी...

जब मेरे बेटे ने ट्रांसवुमन ईशिता से विवाह के अपने फैसले के बारे में मुझे बताया, तो मैंने अपने सभी रिश्तेदारों को बुलाया और उनसे इस बारे में बात की। उन सभी ने इसपर और तो कोई आपत्ति नहीं जताई, किन्तु औलाद को लेकर ही उनकी आपत्ति थी। फिर मैंने अपने रिश्तेदारों को समझाया कि तुमलोगों की यह बात तो सही है। किन्तु स्त्री-पुरुष में भी शादी होती है, तो किसी-किसी के बाल-बच्चे नहीं होते हैं, तो उस वक्त हम क्या करते हैं! उसे तो समाज भी कुछ नहीं कहता।

शक्ति स्वरूपा नहीं मानवी समझने की जरूरत

मंथन करते हुए पाती हूँ कि अब वक्त आ चुका है कि औरतें छाती कूट विलाप छोड़ ,हसिया लहराते राजनीति के मैदान में उतरें बिना किसी क्षेत्र में समानता का अधिकार पाने से रही।मैं और मेरे सवाल देश के आमोखास महिलाओं तक पहुँचे और शुरू हुआ मंथन महिला मुद्दों पर।
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