अफसोस कि औरतें उठ तो रही हैं पर मर्दवादी संस्थाएं उन्हे कुचल देना...

पर अफसोस कि ये मार्च भी देश भर की लोकतांत्रिक संस्थाओं में भर दी गयी महिला विरोध की भावना की भेंट चढ़ गया. मुख्यधारा मीडिया में इस मार्च कि चर्चा आज न के बराबर दिख रही है. खासकर प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जो आम लोगों के बीच अभी सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं वे लगातार सत्ता के खिलाफ जारी राजनीतिक सामाजिक बदलाव को खारिज करने या आम लोगों के बीच न पहुंचने देने में एक षड़यंत्रकारी भूमिका निभा रहे हैं.

सेक्स और स्त्री देह के प्रति सहजता और कुंठा के बीच महीन रेखा

संपादकीय कभी आपने अपनी नानियों, दादियों, मां, मौसी, चाची या आस-पास की औरतों को सेक्स के बारे में बात करते सुना है ! यकीनन आपका...

इतिहास का अंधकूप बनाम बंद गलियों का रूह-चुह : गया में यौनकर्म और...

संजीव चंदन ( यह आलेख २००९ में एक शोध के सिलसिले में किये गये केस स्टडी का एक हिस्सा है :दो किस्तों में प्रकाश्य  )  यद्यपि...

स्त्री-छवियाँ बदली हैं लेकिन आदिवासी स्त्रियाँ आज भी अपने पुरखिन जैसी

अश्विनी पंकज मानव विकास के इतिहास में औरतों की हैसियत क्या थी इसका पता हमें उन गुफा शैल...

हिन्दी नवजागरण और स्त्री

अंजली पटेल ,गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत है. Email : anjalipatelbindki@gmail.com नवजागरणएक कालवाची शब्द है, जहाँ इसकी पृष्ठभूमि विभिन्न आन्दोलनों से जुड़ती है तो वहीं स्त्री उत्थान की...

राजनीति को महिलाओं ने बदला है फिर भी मतदाता उनके प्रति उदासीन

यशस्विनी पाण्डेय धर्म को न मानने वाली एक बिन-ब्याही मां ‘जेसिंडा ऑर्डन’न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री खुद में एक ऐतिहासिक...

सृजन की ताक़त रखने वाली महिलाओं से दुनिया की संस्कृतियाँ क्यों डरती हैं !

राजीव सुमन रजस्वला होने की उम्र की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में के प्रवेश-निषिद्ध के संदर्भ...

व्यावसायिक जोखिम का लैंगिक विमर्श

2010 में मैंने सुप्रीम कोर्ट में सूचना अधिकार के एक आवेदन किया था और टाल मटोल के बाद पता चला कि वहां यौन उत्पीडन...

होली का स्त्रीवादी पाठ

रजनी तिलक  होली मनाया जा रहा है . जनसाधारण में माना जाता है कि इस दिन बुराई पर जीत हुई थी और इसी जीत को जश्न...

औरत मार्च: बदलते पाकिस्तान की दास्तान

भारत  में बढ़ती फिरकापरस्ती के बरक्स जरा पड़ोसी मुल्क को देखें. वहां से स्त्रियों के हक़ में लगातार अच्छी खबरें आ रही हैं. पाकिस्तान ...
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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