डॉन्ट वरी डियर सोनम गुप्ता

प्रियंका बदलते समय ने बहुत सारे लोगों को स्त्री और दलित सरीखी उत्पीड़ित-उपेक्षित अस्मिताओं के पक्ष में दिखावे के लिए ही सही खड़े होने के...

जब मैंने स्त्रियों की माहवारी को पहली बार जाना

जीतेंद्र कुमार   लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. संपर्क: 9968205114 स्त्रियों के लिए माहवारी को टैबू बनाया जाना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है. इसे गोपनीय,  टैबू और लज्जा का...

कब तक नचवाते और तालियाँ बजवाते रहेंगे हम !

( थर्ड जेंडर की पीडा के प्रति संवेदनशीलता के साथ धर्मवीर सिंह ने अस्मिता की आवाज , उसके भीतर के अंतरविरोध , साहित्य ,...

भारतीय लोक तंत्र मोदी को बदल देगा : कुलदीप नैयर

संजीव चंदन बातचीत,  साथ में अरुण चतुर्वेदी  आज वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर नहीं रहे, 95 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया. 2014 में...

पत्थलगड़ी और कोचांग बलात्कार मामला: रांची से प्रकाशित अखबारों की विश्वसनीयता पर प्रश्न

श्रीप्रकाश  झारखंड का खूंटी जिला इन दिनों उबल रहा है-एक ओर आदिवासी पत्थलगड़ी कर स्वायत्तता का घोष कर रहे हैं, वहीं कोचांग में 5 रंगकर्मियों...

रक्षा मंत्रालय ने लिया संज्ञान: सेना के अफसर द्वारा एक लड़की को तेज़ाब फेकने...

स्त्रीकाल डेस्क  रक्षा मंत्रालय ने सेना के एक अफसर के खिलाफ जांच की कार्रवाई शुरू कर दी है. पिछले दिनों मुम्बई में एक पेस्टिसाइड कंपनी...

अपने ही घर में खतरों से घिरी बेटियां

अरविंद जैन स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब...

स्त्री-पुरुष समता का देश भर में अलख जगा रहे राकेश कुमार सिंह से...

पिछले तीन-चार सालों से राकेश कुमार सिंह जेंडर जस्टिस के लिए, महिला-हिंसा के खिलाफ, महिलाओं के प्रति समाज का नजरिया बदलने के लिए, देश...

भारत की मानुषी छिल्लर ने जीता मिस वर्ल्ड 2017 का ताज

मानुषी छिल्लर से पहले साल 2000 में बॉलिवुड और हॉलिवुड की सफल ऐक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा भारत की तरफ से मिस वर्ल्ड बनीं थी। 20...

मर्दाना हकों की हिफ़ाजत करता मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड

नासिरुद्दीन एक बार फिर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुर्खियों में है. और इतिहास गवाह है कि पर्सनल लॉ बोर्ड के सुर्खियों में आने की...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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