रंगभेदी और स्त्री-विरोधी सोच

नवीन रमण  (फेसबुक पर सक्रिय नवीन रमण लागातार अपनी संवेदनशील टिपण्णी से  एक  हस्तक्षेप करते हैं . हरियाणा की खाप पंचायती मनोवृत्ति पर इनके असरकारी...

कम से कम एक दरवाज़ा

सुधा अरोडा सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई ,...

राजनीति का अपराधीकरण और अपराध का राजनीतिकरण

अरविंद जैन सुप्रीम कोर्ट के पाँच न्यायमूर्तियों (दीपक मिश्रा, नरीमन खानविलकर, धनन्जय चंद्रचूड, इंदु मल्होत्रा) की संविधान पीठ का निर्णय (25.9.2018) है कि अदालत उन...

इंसाफ अधूरा है

कुमारी ज्योति गुप्ता कल रविवार( 20 दिसंबर ) को  16 दिसंबर 2012 के निर्भया कांड का एक आरोपी जुबेनाइल होने के आधार छूट जायेगा. आम्बेडकर...

जुंको फुरुता: जिसे याद रखना ही होगा

मंजू शर्मा  आज अगर जुंको फुरुता जीवित होती तो 43वाँ जन्मदिन मना रही होती। दु:खद है कि जापानी गुड़िया विश्वस्तरीय प्रसिद्धि पा चुकी है लेकिन जुंको...

राम-अल्लाह वाले फर्जी पोस्ट की कैराना-सांसद ने की पुलिस में शिकायत,जांच के आदेश

स्त्रीकाल डेस्क कैराना से नवनिर्वाचित सांसद तबस्सुम हसन ने शामली के पुलिस अधीक्षक को अपने नाम पर वायरल किये जा रहे पोस्ट के खिलाफ पत्र...

डॉक्टर मनीषा बांगर ‘वायस ऑफ पीपल’ सम्मान से हुईं सम्मानित !

 राजीव कुमार सुमन    14 सिंतबर 2018 को दिल्ली के माता सुंदरी रोड पर स्थित एवान-ए-गालिब ऑडिटोरियम में पल-पल न्यूज वेब पोर्टल की तरफ से...

माहवारी में थोपे गये पापों से मुक्ति हेतु कब तक करते रहेंगी ऋषि पंचमी...

विनिता परमार हिन्दू व्रतों की स्त्रियों और गैर ब्राह्मण समुदायों के प्रति दुष्टताओं को लेकर आयी यह छोटी सी टिप्पणी जरूर पढ़ें. देखें कैसे अशुद्धि,...

बलात्कृत रंगकर्मियों को पुलिस ने कैद कर रखा है: फैक्ट फाइंडिंग टीम

'यौन हिंसा एवं दमन के खिलाफ महिलायें (WSS)' की अगुआई में झारखंड गयी फैक्ट फाइंडिंग टीम ने अपने अंतरिम रिपोर्ट में कोचांग में गत...

70 साल गौरव के, लोकतंत्र और समतामूलक सपनों के

स्त्रीकाल (प्रिंट )के अक्टूबर-दिसंबर अंक का संपादकीय  संजीव चंदन आजादी के 70 साल में कुछ नहीं हुआ. यह हालिया समय का सबसे बड़ा और बार-बार दुहराया...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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