हवा व अन्य कविताएँ (डॉ. मिथिलेश)

हवा हवा में, खून की सड़ांध... हर कहीं, से आती एक चीख़ मुझे, जीने नहीं देती । निर्भया, आसिफा  और अनगिनत शक्लें... पूँछती हैं... क्या यही – वह, सभ्य समाज...

अपने विचारों और व्यक्तित्व की विराटता के साथ प्रासंगिक महामानव: डॉ. अम्बेडकर

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को आज उनके महापरिनिर्वाण दिवस पर पूरा देश याद कर रहा है, पूरी दुनिया याद कर रही है. आज...

पत्नियां प्रेमिकाएं नहीं होतीं व अन्य कविताएँ (कंचन कुमारी)

पत्नियां प्रेमिकाएं नहीं होतीं पत्नियां प्रेमिकाएं नहीं होतीं इसलिए उनका विद्रोही होना अमर्यादित होता है । पत्नियां नहीं पहुंचती चरमसुख तक यह हक है सिर्फ प्रेमिकाओं...

भाई न होता तो मैं सावित्रीबाई फुले को नहीं जान पाती

किसी अपने के बारे में कुछ भी लिखना कितना मुश्किल होता है यह मुझे आज समझ में आया। वैसे मैंने सोचा नहीं था कि...

इंकिलाबी तेवर की शौकत

राह का खार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे बन के तूफान छलकना है उबलना है तुझे रूत बदल डाल अगर फूलना-फलना है तुझे उठ मेरी...

विद्रोह: क्रांतिकारी परिवर्तन का उपन्यास.

'विद्रोह' युवा साहित्यकार कैलाश चंद चौहान का तीसरा उन्यास है। इससे पहले कैलाश चंद चौहान का पहला उपन्यास 'सुबह के लिए' तथा दूसरा उपन्यास...

नबनीता देव सेन की कविताएं

7 नवंबर 2019 को कैंसर की वजह से नबनीता देव सेन नहीं रहीं. बंगाल की कवयित्री, गीतकार, व्यंग्य लेखिका राधारानी देबी की बेटी पद्मश्री...

माँ मैं आपकी गुनाहगार हूँ!

मां और मैं साथ में बैठे थे. मां ने धीरे से मेरा सिर अपनी गोद में रख लिया था. मैं और मां ऐसे ही बहुत देर तक बैठे रहे. मैने मां को स्पेन जाने के बारे में बताया और कर्नाटक के बारे में भी बाताया. मां ने बालों में हाथ फ़ेरते हुए ही कहा कि कब जाना है तो मैने अपनी डेट बता दी कि 30.10.2018 को कर्नाटक और फ़िर अगली रात यानि दो को स्पेन जाना है. मैने लेटे लेटे ही कहा कि-“अब की बार तू मेरे पास नहीं थी इसलिए मैं आ गयी जाने से पहले मिलने”. मेरी हर विदेश यात्रा में जाने से पहले मां मेरे साथ रही है लेकिन अब की बार नहीं थी मेरे पास दिल्ली में.

बौद्ध देश की यात्रा-2

वहाँ के लोगों में वो अनुशासन हर चीज़ में दिखाई देता है। चाहे बाथरूम हो, घर हो, रेस्टरूम हो, सार्वजनिक जगह हो या कोई अपनी व्यक्तिगत प्रॉपर्टी ही क्यूँ न हो। रेस्टरूम जो मेरे जहन के सबसे करीब रहता है। शायद इसलिए की इसके अनुभव मेरे जीवन का अहम हिस्सा रहे हैं। इसलिए किसी भी देश में जाऊं मेरा ध्यान बरबस ही इस ओर चला जाता है।

बौद्ध देश की यात्रा

बुद्धिज्म के मायने क्या है, इसे मैंने जापान में अनुभव किया है। व्यवहारिकता में देखा है कि यह धर्म केवल बौद्ध विहार में जाना और भिक्षु बन जाना ही बौद्ध बन जाना नहीं है, बल्कि उसे अपने जीवन में धारण कर उसी पथ पर चलना ही बौद्ध है. यहा धर्म की आस्था की तरह यह धर्म है ही नहीं बल्कि मानव मात्र के कल्याण के लिए ही समाज बना और उसे मनुष्यों ने अपनी आवश्यकता अनुसार धारण कर लिया, ऐसा जाना मैने इसे। भारतीय बौद्धों को जापान से सीख लेने की ज़रूरत है अन्यथा भारत के बुद्धिस्ट तो यही देखने में लगे रहते है कि कौन क्या पहन-ओढ़ रहा है। यही हमारा पैमाना बन गया है बुद्धिज्म का।
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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