दलित स्त्रियाँ खुद लिखेंगी अपना इतिहास

हेमलता हेमलता ने 'दलित अस्मिता और शिक्षा' पर शोध किया है.सम्पर्क :hmdehrwal@gmail.com अनिता भारती आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। अपने तीखे और सटीक शब्दों...

प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री

( रानी कुमारी के द्वारा 'प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री' विषय पर आयोजित संगोष्ठी की रपट।  रानी दिल्ली वि वि में शोधरत  हैं....

अल्पना मिश्र की 5 कवितायें

(अल्पना मिश्र की अधिकांश कहानियां निम्न मध्यमवर्गीय परिवेश की लडकियों /पात्रों की पीडा और संघर्ष की कहानियां होती हैं. आज उनका जन्मदिन है उनके जन्मदिन पर...

निराला की कविता में स्त्री मुक्ति का स्वर

नीरज कुमार निराला का ब्याह तेरह (13) बरस की उम्र के आस-पास हो गया था। तकरीबन सोलह (16) बरस की उम्र में उनका गौना हुआ।...

दलित स्त्री-लेखन का पहला दस्तावेज: मांग महारों का दुःख (1855)

मुक्ता सालवे/अनुवाद: संदीप मधुकर सपकाले  फुले-दम्पति (महात्मा फुले-सावित्री बाई फुले) द्वारा स्थापित देश के पहले बालिका-विद्यालय में मात्र 3 सालों की पढ़ाई के बाद मांग...

डोंट यू नो, हंसना इज़ एन इन्वीटेशन टू रेप?

रोहिणी अग्रवाल रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com देह के द्वार पर अनादृत...

स्त्री आत्मकथा – अस्मिता संघर्ष तथा आत्मनिर्भर स्त्री

कुमारी ज्योति गुप्ता कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com संदर्भ-प्रभा खेतान और मैत्रेयी पुष्पा  हिंदी जगत...

सावित्री हमारी अगर माई न होती

जोतीबा  फुलेकी जयंती  (11 अप्रैल) पर उन्हें और सावित्रीबाई  फुलेको याद करते हुए  बाल गंगाधर “बागी” की कविता पढ़ते है.  क्रांति ज्योति सावित्रीबाई फुले सावित्री हमारी अगर...

सावित्री बाई फुले की कवितायें

( आज 3 जनवरी को भारत की आदि शिक्षिका सावित्री बाई फुले की जयंती है . उन्होंने 1848 में लडकियों के लिए प्रथम स्कूल...

न्याय के भंवर में भंवरी

मंजुल भारद्वाज 25 सालों से रंगमंच में सक्रिय. फाउंडर थियेटर ऑफ़ रेलेवेंस. संपर्क :09820391859 स्त्री-अधिकार की मुखर नायिका सावित्रीबाई फुले के स्मृति दिवस (10...
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लोकप्रिय

भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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