आरती रानी प्रजापति की कवितायें

आरती रानी प्रजापति जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com 1 हाँ मैंने महसूस किया है तुम्हारी देह को हर बार तुम...

जेंडर और पितृसत्ता पर क्रांतिकारी आंदोलन के नजरिए की एक आलोचना

महिलाओं की मुक्ति के बिना क्रांति मुमकिन नहीं और क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं 1. सन 2004 में महिला संगठनों और कार्यकर्ताओं द्वारा क्रांतिकारी...

मातृवंशात्मक समाज में स्त्री

आकांक्षा  महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग में शोधरत। संपर्क : ई मेल-akanksha3105@gmail.com आमतौर पर कुछ माता –प्रधान समाजों को मातृसत्तात्मक समाज कह दिया...

क्या पुरुष अपने समदुखी ‘मीत’ की व्यथा -कथा समानुभूति से लिखेंगे ?

सुधा अरोड़ा सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स ,...

एक ऐसा इतिहास कि जो लिखा न गया किताबों में

फारूक शाह मिजाज से फकीर और विचार से दार्शनिक फारूक शाह हिंदी और गुजराती के  कवि और आलोचक हैं .  ये   विशेष तौर पर...

अशोक कुमार पाण्डेय की कवितायें

अशोक कुमार पाण्डेय सोशल मीडिया में बेवाक सक्रिय अशोक कुमार पाण्डेय बेहद संवेदनशील कवि हैं. संपर्क :ashokk34@gmail.com कहां होंगी जगन की अम्मा ? सतरंगे प्लास्टिक...

महाभूत ( चन्दन राय ) की कवितायें

महाभूत चन्दन राय कविताओं मे अपने बिम्ब और कथन के साथ उपस्थित युवा कवि महाभूत चन्दन राय युवा पीढी के कवियों मे एक मह्त्वपूर्ण...

मेरे पिता

पवन करण पवन करण हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि हैं. 'स्त्री मेरे भीतर' चर्चित  कविता संग्रह . संपर्क :  pawankaran64@rediffmail.com बहन और मां के प्रेम के पक्ष...

पवन करण की पांच कवितायें

पवन करण पवन करण हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि है, ग्वालियर में रहते हैं. इनसे इनके ई मेल आई डी pawankaran64@rediffmail.com पर संम्पर्क किया जा सकता...

नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली अफ्रीकी-अमेरिकी महिला–टोनी मॉरिसन

राजीव सुमन टोनी मॉरिसन को सामजिक मुद्दों पर अपनी सूक्ष्म और स्पष्ट दृष्टिकोण रखने के साथ-साथ उनके तीक्ष्ण शब्द...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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