ऐ री मोलकी

सुनीता धारीवाल जागिंड सामाजिक कार्यकर्ता . ब्लॉगर , कानाबाती ब्लॉग की और वीमेन टी वी इंडिया पोर्टल की मोडरेटर, संपर्क: suneetadhariwal68@gmail.com . आज गांव जल...

जब जरा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार

( निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘...

‘दलित साहित्य : एक अन्तर्यात्रा’

अनुपम सिंह अनुपम सिंह दिल्ली वि वि में शोधरत हैं. संपर्क :anupamdu131@gmail.com बजरंग बिहारी तिवारी की पुस्तक ‘दलित साहित्य : एक अन्तर्यात्रा’ का 13 ॰09...

मनुस्मृति दहन के आधार : डा आम्बेडकर

( 25 दिसंबर को  ' मनुस्मृति दहन दिवस'  के रूप में भी मनाया जाता है , जिसे स्त्रीवादियों का एक समूह ' भारतीय महिला...

हवा सी बेचैन युवतियां ‘दलित स्त्रीवाद की कविताएं’

 बेनजीर रजनी तिलक को मै क्रांतिकारी कवयित्री के रूप में देखती हूँ. .इनकी कविताओं में जो बेबाक अभिव्यक्ति का स्वर  है , वह अद्भुत है....

ताकि बोलें वे भी, जो हैं सदियों से चुप

अनिल अनलहातु  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेजी की कविताएं प्रकाशित. “प्रतिलिपि” कविता सम्मान’2015. संपर्क :analhatukavita@gmail.com, 08986878504 (आज मनु स्मृति दहन  दिवस  के  दिन , भारतीय ...

कविता की प्रकृति ही है समय से आगे चलना

इन प्रमुख प्रगतिशील कवियों के पीछे प्रगतिशील लेखक संघ काम कर रहा था और साहित्‍य में प्रमुख रूप से जनवादी चेतना और फासिज़्म के विरोध के पीछे भी प्रगतिशील लेखक संघ काम कर रहा था। राजसत्‍ता, राजतंत्र के ख़िलाफ़ जनवादी आवाज़ का उठना ही तत्‍कालीन स्थिति के आधार पर बड़ी बात थी। 1942 की अगस्‍त क्रांति, भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी का रूस समेत मिश्र राष्‍ट्रों का और एक तरह से ब्रिटिश सरकार का ही पक्ष समर्थन करना, इसी बीच बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा, इस तरह देखा जाए तो 1939 से 1946 तक का दौर अनेक प्रकार के जटिल राजनीतिक और सामाजिक प्रश्‍नों का दौर बन गया।

नाम जोती था मगर वे ज्वालामुखी थे

महात्मा जोतीबा  फुले की जयंती  (11 अप्रैल ) पर विशेष....  मनीषा बांगर और डा. जयंत चंद्रपाल  इनका जीवनक्रम ज्योति था बिलकुल ज्योति की तरह अन्धकार को...

स्त्री अस्मिता आंदोलन इतिहास के कुछ पन्ने

आलोक कुमार यादव जे.एन.यु.में शोधार्थी, नई दिल्ली . संपर्क:alokjnu87@gmail.com मोबाइल : 8010333108  प्राचीन काल से ही स्त्री, स्त्री का शोषण, उसकी समस्याएँ, उसकी सामाजिक स्थिति उसका विकास...

राष्ट्रवाद, विश्वविद्यालय और टैंक: संदीप मील की कहानी

संदीप मील ''हमारी बात की खिलाफ़त करने वालों का मुँह बंद कर दो।'' ''जनरल, सारी ताक़त इसी पर लगा रखी है। जल्द ही हो जाएगा।'' ''तुम समझ...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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