महात्मा जोतीबा फुले का ब्राह्मणवाद से संघर्ष

सुजाता पारमिता बिना विद्या मति गयी, बिना मति नीति गयी। बिना नीति गति गयी, बिना गति वित्त गया। बिना वित्त शुद्र दबा, इतना अनर्थ अविद्य से हुआ। -जोतीबा...

पत्नियां प्रेमिकाएं नहीं होतीं व अन्य कविताएँ (कंचन कुमारी)

पत्नियां प्रेमिकाएं नहीं होतीं पत्नियां प्रेमिकाएं नहीं होतीं इसलिए उनका विद्रोही होना अमर्यादित होता है । पत्नियां नहीं पहुंचती चरमसुख तक यह हक है सिर्फ प्रेमिकाओं...

धार्मिक औरतें या गुलाम औरतें ….!

 संजय सहाय  सन् 2000 में शनि शिंगनापुर मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश पर निषेध के खिलाफ एक पदयात्रा आयोजित की गई थी. पंढरपुर से शनि...

हवा व अन्य कविताएँ (डॉ. मिथिलेश)

हवा हवा में, खून की सड़ांध... हर कहीं, से आती एक चीख़ मुझे, जीने नहीं देती । निर्भया, आसिफा  और अनगिनत शक्लें... पूँछती हैं... क्या यही – वह, सभ्य समाज...

भारतेंदु की स्त्री चेतना का स्वरूप, सन्दर्भ: ‘बालाबोधिनी’ पत्रिका

  अरुण कुमार प्रियम स्वतंत्र लेखन संपर्क : 9560713852 Email. akpriyam@gmail.com भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक माने जाते हैं ! खड़ी बोली...

सुजाता पारमिता की दो लघु कथायें: अल्लादीन का चिराग और विक्रमादित्य का...

अल्लादीन का चिराग इक्कीसवीं सदी में अल्लादीन का खोया हुआ चिराग रसिक लाल के हाथ लग गया। जिसे बीती रात ही मातादीन मोची अपनी बीमार...

स्त्रीवादी भी.मार्क्सवादी भी करते हैं लिंचिंग: पाखी पत्रिका का बलात्कार प्रकरण

सुशील मानव  पाखी की अनैतिक साहित्यिक पत्रकारिता के असर से वयोवृद्ध आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी की सोशल मीडिया में आलोचना हुई-एक हद तक वे ट्रोल हुए....

पितृसत्ता से आगे जहाँ और भी है

राहुल सिंह युवा आलोचक, हिन्दी साहित्य का  प्राध्यापक संपर्क : alochakrahul@gmail.com इस समय प्रचलित विमर्शों की गर थोड़ी जानकारी हो तो निश्चित तौर पर आप स्त्री...

प्रत्यक्ष प्रमाण से आगे और सूक्ष्म संवेदना की कविताएं : अभी मैंने देखा

सुनीता गुप्ता अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित ‘अभी मैंने देखा’ शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का संकलन है, जिसका प्रकाशन इसी वर्ष हुआ है। फिल्म तथा प्रयोगात्मक...

तो देख्यो है घूंघट पट खोल- मीराबाई : हिन्दी की पहली स्त्रीवादी : आख़िरी...

रोहिणी अग्रवाल रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com मीरा उत्पीड़न का विरोध कर...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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