चंद्रकांत देवताले की याद में उनकी कविताएं : बाई दरद ले ले और अन्य

साठोत्तरी हिन्दी हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर चंद्रकांत देवताले नहीं रहे. उन्हें आदरांजलि देते हुए उनकी कुछ स्त्रीवादी कविताएं:  माँ पर नहीं लिख सकता कविता  माँ...

बिहार और जातिवाद का इतिहास ‘दिनकर’ की कलम से:

डॉ.रतन लाल एसोसिएट प्रोफेसर इतिहास विभाग हिन्दू कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय संपर्क : lalratan72@gmail.com. भारत में जब चुनाव या किसी अन्य गतिविधि की चर्चा होती है तब निःसंदेह जातिवाद की...

नीलिमा सिन्हा की कवितायें : वर्किंग वीमेन और अन्य

नीलिमा सिन्हा कथाकार नीलिमा सिन्हा कवितायें भी लिखती रही हैं. संप्रति संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा में प्रतिकुलपति के रूप में कार्यरत . संपर्क neelima_sinha04@rediffmail.com...

जच्चा

अनिता भारती अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं -...

स्वर्णलता ठन्ना की कविताएँ

स्वर्णलता ठन्ना युवा कवयित्री स्वर्णलता ठन्ना फिलहाल विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में शोधरत हैं . संपर्क :swrnlata@yahoo.in सजा समाज के ढकोसलों उठते प्रश्नचिन्हों से झुलसती उठती उँगलियों की नोंक पर...

बिल्किस … तुम कहाॅं हो …. ?

प्रो.परिमळा अंबेकर प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं हिन्दी में इनकी यह...

लायब्रेरी की सीढियों पर प्रेम और अन्य कविताएँ

आरती तिवारी विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित संपर्क:atti.twr@gmail.com लायब्रेरी की सीढियों पर प्रेम प्रेम के पल जिन्हें लाइब्रेरी की सीढ़ियों पे बैठ हमने बो दिए थे बंद-आँखों की नम...

खोल दो ..

सआदत हसन मंटो की जयंती पर आज उनकी 'खोल दो' कहानी स्त्रीकाल के पाठकों के लिए . बलात्कार पीडिता के दर्द को अभिव्यक्त करती...

दो पीढी तीन कवितायें

( शेफलिका  कुमार और अंजना वर्मा दो पीढियों से हैं - बेटी और मां , दोनो की कवितायें एक साथ पढें ) शेफलिका कुमार की कवितायें डॉ०...

ममता कालिया की कहानियों में दाम्पत्य- संबंधों में द्वन्द्व

डॉ. चरणजीत सिंह सचदेव एसोसिएट प्रोपफेसर, हिंदी विभाग श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय. संपर्क :मोबाईल 9811735605 संबंधों का हमारे जीवन में बहुत महत्व होता है....
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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