दस द्वारे का पिंजरा: स्त्री मुक्ति की संघर्ष गाथा

अनामिका कृत ‘दस द्वारे का पिंजरा’ उपन्यास सन् 2008 को प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में नये प्रयोगों के कारण अनामिका जी को कई पुरस्कारों...

समकालीन महिला लेखन को संबोधित संगोष्ठी

पहले सत्र में मुंबई के कलाकारों की एक टीम 'जश्न- ए- कलम' की शश्विता शर्मा ने इस्मत चुग़ताई की प्रसिद्ध कहानी 'छुईमुई' तथा राजेश कुमार ने राजेंद्र यादव की कहानी 'किनारे से किनारे तक' की एकल प्रस्तुति की।

होली का स्त्रीवादी पाठ

रजनी तिलक  होली मनाया जा रहा है . जनसाधारण में माना जाता है कि इस दिन बुराई पर जीत हुई थी और इसी जीत को जश्न...

सुषम बेदी के उपन्यासों में प्रवासी स्त्री यथार्थ

कुमारी ज्योति गुप्ता कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com ‘‘हम न भूलेंगे, हम हैं भारतवासी’’...

प्रभा खेतान के साहित्य में स्त्री जीवन का संघर्ष

पंकज कुमार जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में शोधरत है. संपर्क:ssatyarthi39@gmail.com स्त्री विमर्श अपने आप में पुरुष द्वारा थोपी गई जाति के लैंगीकरण  की अमानवीय व्यवस्था के विरूद्ध...

नाक की फुरूहुरी: सोनी पांडेय कहानी

सोनी  पांडेय सोनी पांडेय लगातार लोक जीवन और ग्रामीण स्त्री-जीवन की प्रभावशाली कहानियाँ लिख रही हैं. ऐसे समय में जब महिला लेखन में यह परिवेश लगभग...

बेडटाइम स्टोरीज : ‘ स्वीट ड्रीम्स’: सेक्स पोर्न और इरॉटिका का ‘साहित्य’ बाजार -2

अर्चना वर्मा अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : जे-901, हाई-बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डेन, अहिंसा खण्ड-2, इन्दिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014, इनसे इनके...

स्त्री मुक्ति का यथार्थ

कुमारी ज्योति गुप्ता  चूकि कि यह समाज पुरुषप्रधान है इसलिए अधिकांश  स्त्रियां भी पुरुषवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। पुरुषों की मानसिकता को बदलना जितना जरूरी...

हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश, भाग 2

जयश्री रॉय जयश्री रॉय कथा साहित्य में एक मह्त्वपूर्ण नाम हैं. चार  कहानी संग्रह , तीन उपन्यास और एक कविता संग्रह प्रकाशित हैं ....

घर/कहानी

नीरा परमार  कविता, कहानी और शोध -आलोचना के क्षेत्र में योगदान. एक कविता और कहानी संग्रह प्रकाशित . संपर्क : parmarn08@gmail.com नीरा परमार हाशिये...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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