भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें(दूसरी किस्त)

रोहिणी अग्रवाल रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com धर्म और कानून: समदरसी है...

श्रम साध्य था किन्नरों से बातचीत कर उपन्यास लिखना: नीरजा माधव

थर्ड जेंडर  पर केन्द्रित प्रथम हिंदी उपन्यास यमदीप की लेखिका नीरजा माधव से एम. फ़ीरोज़ खान की बातचीत क्या कारण है कि आज के लेखक...

प्यार में टूटी सीमोन का खत प्रेमी के नाम

सौम्या गुलिया सौम्या दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी हैं.नाटक के एक समूह 'अनुकृति' से जुड़ी हैं. संपर्क : ई मेल-worldpeace241993@gmail.com अनुवादक का नोट...

राजेंद्र यादव से मन्नू का प्रेम ठोस था: वे पत्नी और प्रेमिका दोनो रहीं

वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा से पाखी के राजेंद्र यादव विशेषांक  के लिए प्रेम भारद्वाज ने 2011 में बातचीत की थी. तब राजेंद्र जी जीवित...

‘दर्दजा‘: हव्वा को पता होता तो वह बेऔलाद रह जाती

प्रो. चन्द्रकला त्रिपाठी प्रोफेसर, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस. वरिष्ठ आलोचक. सम्पर्क : मो.9415618813 ‘दर्दजा’ पढ़ते हुए आप हर्फ ब हर्फ़ खुद को स्त्री पर हमलावर यातनाओं को...

खोल दो ..

सआदत हसन मंटो की जयंती पर आज उनकी 'खोल दो' कहानी स्त्रीकाल के पाठकों के लिए . बलात्कार पीडिता के दर्द को अभिव्यक्त करती...

रजनी अनुरागी की कवितायें

रजनी अनुरागी रजनी अनुरागी कविता में एक महत्वपूर्ण उपस्थिति हैं . रजनी कविताओं के लिए शीला सिद्धान्तकर सम्मान से भी सम्मानित हैं ....

वे सख्त दिल मह्बूब: सफ़र के क़िस्से

पहले रोज़ लुम्बिनी का सैर करना तय पाया गया , गौतम बुद्ध की जन्मस्थली देखने की शदीद ख़ाहिश थी , उसकी एक वजह ये थी कि बचपन से गौतम बुद्ध की अच्छाई की नेकी की बहुत सी कहानियां अम्मी से सुन रखी थी , या यूँ कह लें उनके क़िस्से कहानियां सुन कर बड़े हुए थे हम। परिंदे से नेक सुलूक की दास्तान और वो कविता जो अम्मी हमें सुनाती थीं,"

आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : आख़िरी किस्त

रमणिका गुप्ता रमणिका गुप्ता स्त्री इतिहास की एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं . वे आदिवासी और स्त्रीवादी मुद्दों के प्रति सक्रिय रही हैं . 'युद्धरत...

मै ही हूँ मैला आंचल में डाक्टर ममता: लतिका

 किसी इंसान , महान व्यक्तित्व , सार्वजनिक जीवन की शख्सियत -लेखक , कलाकार को जानने -समझने का उसके हमसफ़र का उसके प्रति के नजरिये...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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