भारतेन्दु हरिश्चंद्र की पत्रकारिता और स्त्री-मुक्ति के प्रश्न

यह कहना कतई गलत न होगा कि उन्नीसवीं सदी के हिन्दी समाज का लोकवृत्त भारतेन्दु के इर्द गिर्द ही गढ़ा जा रहा था। उस युग में सामाजिक, साहित्यिक और राजनीतिक बदलावों का वाहन बनने वाली कई महत्त्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना भारतेन्दु ने की थी। उनके युग के सभी महत्त्वपूर्ण रचनाकार और पत्रकार हरिश्चंद्र मंडल में शामिल थे। रामविलास शर्मा ने भारतेन्दु युग नामक अपनी पुस्तक में लिखा है

यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता

एल.जे. रूस्सुम/ अनुवाद : डा अनुपमा गुप्ता (एल .जे .रुस्सुम का यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए भेजा गया था , जिसे हम...

दलित स्त्रीवाद अंतरजातीय विवाह को सामाजिक बदलाव का अस्त्र मानता है -रजनी...

दलित स्त्रीवाद की सशक्त प्रवक्ता,  दलित और स्त्री सामाजिक आन्दोलन की प्रखर प्रतिनिधि एवं लेखिका रजनीतिलक से अरुण कुमार प्रियम की बातचीत. यह बातचीत...

नील नीले रंग के

प्रियंका सोनकर  प्रियंका सोनकर  असिस्टेन्ट प्रोफेसर दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय. priyankasonkar@yahoo.co.in “भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात वैश्विक स्तर पर उसका एक मजबूत स्थान कहीं न...

अलकनंदा साने की कविताएं

अलकनंदा साने  हिंदी - मराठी में समान रूप से लेखन एवं इस क्षेत्र में लगभग ४५ वर्षों से सक्रिय हिंदी मराठी की अनेक पत्र-पत्रिकाओं...

प्रियंका सिंह की कवितायें

प्रियंका सिंह प्रियंका सिंह कवितायें और कहानियां लिखती हैं . दिल्ली में रहती हैं . संपर्क: priyanka.2008singh@gmail.com १. तुम कुछ नहीं तुम पढ़ गयी हो बिगड़ गयी...

प्रेमा झा की कविताएँ

प्रेमा झा प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ  और कविताएँ प्रकाशित. फिलवक्त अपने एक उपन्यास को लेकर शोधरत . संपर्क : ईमेल - prema23284@gmail.com मेरा प्रेमी पाकिस्तानी है अक्सर...

पूरन सिंह की कवितायें

डा. पूरन सिंह चर्चित साहित्यकार पूरन सिंह कृषि भवन में सहायक निदेशक हैं. संपर्क : drpuransingh64@gmail.com> आई लव यू वह मुझे बहुत प्यार करता गलियों/सड़कों/चैराहों पर चीखता-चिल्लाता आई लव यू,...

हिन्दी आलोचना में स्त्री के प्रति संवेदना नहीं है: सविता सिंह

रेखा सेठी   हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर. विज्ञापन डॉट कॉम सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचनात्मक और...

होली का स्त्रीवादी पाठ

रजनी तिलक  होली मनाया जा रहा है . जनसाधारण में माना जाता है कि इस दिन बुराई पर जीत हुई थी और इसी जीत को जश्न...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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