स्पीड ब्रेकर / कहानी

डा .कौशल पंवार कौशल पंवार दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में संस्कृत पढाती हैं. उनसे उनके मोबाइल न.  09999439709 पर सम्पर्क किया जा सकता है.  ...

जख्म हरे हैं आज भी

निवेदिता निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह...

औरतें

एदुआर्दो गालेआनो / अनुवादक : पी. कुमार  मंगलम  अनुवादक का नोट  एदुआर्दो गालेआनो (3 सितंबर, 1940-13 अप्रैल, 2015, उरुग्वे) अभी के सबसे पढ़े जाने वाले लातीनी...

रानी बेटी

प्रीति प्रकाश  तेजपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधरत प्रीति प्रकाश की कहीं भी प्रकाशित यह पहली कहानी है. शारीरिक और आर्थिक रुग्णता की शिकार...

बिहार बंद तस्वीरों में: राकेश रंजन की कविता के साथ

स्त्रीकाल डेस्क  जनाक्रोश रंग ला रहा है. बिहार सरकार जनता की नजरों में कटघरे में है तो सुप्रीमकोर्ट इस मामले में स्वतः-संज्ञान लेते हुए केंद्र...

नीलम मैदीरत्ता ‘गुँचा’ की कविताएँ

नीलम मैदीरत्ता प्रकाशित संग्रह : “तेरे नाम के पीले फूल” कविताएँ/आलेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित संपर्क : ईमेल -neelammadiratta@rediffmail.com / neelamadiratta@gmail.com 1. सब से अमीर होती है वह...

यस पापा

अरविंद जैन स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब...

कुमकुम में लिपटी औरते

सुनीता झाड़े सुनीता झाड़े मराठी और हिन्दी में कविताएँ  लिखती हैं  तीन मराठी कविता संग्रह प्रकाशित संपर्क: commonwomen@gmail.com एक डोर बेल बजाने के कोई तीसरी चौथी बार...

लाजवन्ती

प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष . आलोचना और कहानी लेखन  संपर्क:09480226677 लाजवन्ती....!!  हाॅं ... उसका नाम लाजवन्ती था...

प्रियंका सिंह की कवितायें

प्रियंका सिंह प्रियंका सिंह कवितायें और कहानियां लिखती हैं . दिल्ली में रहती हैं . संपर्क: priyanka.2008singh@gmail.com १. तुम कुछ नहीं तुम पढ़ गयी हो बिगड़ गयी...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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