बौद्ध देश की यात्रा-2

वहाँ के लोगों में वो अनुशासन हर चीज़ में दिखाई देता है। चाहे बाथरूम हो, घर हो, रेस्टरूम हो, सार्वजनिक जगह हो या कोई अपनी व्यक्तिगत प्रॉपर्टी ही क्यूँ न हो। रेस्टरूम जो मेरे जहन के सबसे करीब रहता है। शायद इसलिए की इसके अनुभव मेरे जीवन का अहम हिस्सा रहे हैं। इसलिए किसी भी देश में जाऊं मेरा ध्यान बरबस ही इस ओर चला जाता है।

पंकज चौधरी की कविताएं

पंकज चौधरी पंकज चौधरी मूलतः कवि और पेशे से पत्रकार हैं . कविता संग्रह 'उस देश की कथा' प्रकाशित। सम्‍मान/पुरस्‍कार- प्रगतिशील लेखक संघ का...

सुधार नहीं पूर्ण बदलाव चाहेंगी महिलायें

नूर जहीर 'डिनायड बाय अल्लाह' और 'अपना खुदा एक औरत' जैसी चर्चित कृतियों की रचनाकार संपर्क : noorzaheer4@gmail.com. कॉमन सिविल कोड के संघर्ष में तीन पक्ष...

इला कुमार की कवितायें

इला कुमार इला कुमार का पहला कविता संग्रह 'जिद मछली की' है । 'किन्‍हीं रात्रियों में' 'ठहरा हुआ अहसास' और 'कार्तिक का पहला...

स्त्री रचनाधर्मिता की दो पीढियां .

( दो –दो कवितायें दो पीढियों की कवयित्रियों की. पूनम सिंह और पूजा प्रजापति की कवितायें. फर्क सामाजिक स्थितियों का  भी है. ) स्त्री (...

स्वयं सिद्धा !

रंजना गुप्ता दो कविता संग्रह(रजनी गन्धा,परिंदे),एक कहानी संग्रह(स्वयं सिद्धा) प्रकाशित! निजी व्यवसायी, स्वतंत्र लेखन! संपर्क : ranjanaguptadr@gmail.com सुष्मिता आज ऑफिस जाने के मूड में नही...

कामसूत्र से अब तक

आरती रानी प्रजापति आरती जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी हैं. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com समाज का एक वक्त (आदिम समाज )ऐसा था,...

बिल्किस … तुम कहाॅं हो …. ?

प्रो.परिमळा अंबेकर प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं हिन्दी में इनकी यह...

ऐ री मोलकी

सुनीता धारीवाल जागिंड सामाजिक कार्यकर्ता . ब्लॉगर , कानाबाती ब्लॉग की और वीमेन टी वी इंडिया पोर्टल की मोडरेटर, संपर्क: suneetadhariwal68@gmail.com . आज गांव जल...

जाज़िम

सोनी पांडेय कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :pandeysoni.azh@gmail.com अन्धेरा घिरने लगा तो कनिया ताड़ का झांडू लिए छत...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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