जेंडर की अवधारणा और अन्या से अनन्या

भावना मासीवाल भावना मासीवाल महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं संपर्क :bhawnasakura@gmail.com; जब महिलाओं ने अपनी सामाजिक भूमिका को लेकर सोचना-विचारना...

‘हंडेर’ हरियाणवी छोरी और आधी आबादी की आज़ादी

नवीन रमण  अनुराधा बेनीवाल की ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ पढ़ी, पढ़ते ही अनुराधा के लिए जो पहला शब्द  ख़्याल में आया वो है ‘हंडेर’। जिसका अर्थ...

“मैना का ख़ून” और ज़ूबी मंसूर की अन्य कविताएं

ज़ूबी मंसूर पेशे से पत्रकार. वॉइस ऑफ़ इंडिया, महुआ न्यूज़ बिहार और p7 न्यूज़ में अस्सिटेंट प्रोड्यूसर रही हैं. "मैना का ख़ून" 13 बरस का साल था सफ़ेद...

गुनिया की माई

सोनी पांडेय कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :dr.antimasoni@gmail.com विवाह के छः वर्षो के बाद गाँव जाना मेरे लिए...

पुस्तक मेले की 'मानुषी' से गायब गैरद्विज स्त्री

दिल्ली में 'वर्ल्ड बुक फेयर' नाम से किताबों का सात दिनों का मेला आज यानी रविवार, 15 जनवरी, को समाप्त होगा- अपने अंतिम दो...

दस द्वारे का पिंजरा: स्त्री मुक्ति की संघर्ष गाथा

अनामिका कृत ‘दस द्वारे का पिंजरा’ उपन्यास सन् 2008 को प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में नये प्रयोगों के कारण अनामिका जी को कई पुरस्कारों...

इंकिलाबी तेवर की शौकत

राह का खार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे बन के तूफान छलकना है उबलना है तुझे रूत बदल डाल अगर फूलना-फलना है तुझे उठ मेरी...

जिज्ञासा

अभिनव मल्लिक सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय अभिनव मल्लिक फारवर्ड प्रेस के संवाददाता है संपर्क :abiotdrugs@gmail.com उस दिन मैं अपने क्लिनिक,त्रिलोकनाथ स्मृति स्वास्थ्य केंद्र  में मरीज़...

शंखमुखी शिखरों का कवि : लीलाधर जगूड़ी

रविता कुमारी हिंदी विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार, उत्तराखण्ड ईमेल: ravita_kumari@yahoo.in साहित्य में विचारधारा को उत्तराधुनिकता के नाम से जाना जा रहा है. आजकल इसकी चर्चा जोरों...

घोंसला (स्वाति श्वेता) की कहानी

स्वाति श्वेता सहायक प्रवक्ता, गार्गीकालेज', दिल्ली वि.वि. कैरेक्टर सर्टिफिकेट ( कहानीसंग्रह),ये दिन कर्फ़्यू के हैं (कविता-संग्रह). संपर्क: swati.shweta@ymail.com मुझे लगता है कि अब मैं बुढ़ाने लगा...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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