सुर बंजारन

भगवानदास मोरवाल  वरिष्ठ साहित्यकार. चर्चित उपन्यास: कला पहाड़, रेत आदि के रचनाकार. संपर्क : bdmorwal@gmail.com मो.  9971817173 काला पहाड़ और रेत जैसे चर्चित उपन्यासों के रचनाकार भगवानदास मोरवाल...

नीच (रज़िया सज्जाद ज़हीर की कहानी)

रज़िया सज्जाद ज़हीर महिला लेखन की एक प्रमुख हस्ताक्षर रज़िया  ज़हीर का यह जन्मशताब्दी वर्ष है. नाटक,कहानी और उपन्यास लेखन के साथ-साथ वे एक बेहतरीन...

जेंडर और जाति के कुंडलों को तोडता लेखन और सत्ता की कुर्सी

( पिछले दिनों हिन्दी अकादमी,  दिल्ली की अध्यक्ष के रूप में मैत्रेयी पुष्पा की नियुक्ति के सन्दर्भ से पुष्पा के लेखन की राजनीति और...

समकालीन ग़ज़ल में मुखर होता महिला रचनाकारों का स्वर

के. पी. अनमोल हिन्दी ग़ज़ल क्षेत्र के उल्लेखनीय गज़लकार और आलोचक. ‘साहित्य रागिणी’ और ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका के संपादक.. संपर्क : मो. 8006623499 kpanmol.rke15@gmail.com दुष्यन्त कुमार के...

अनीता चौधरी की कविताएँ

अनीता चौधरी साहित्यकार अनीता चौधरी हमरंग.कॉम का संपादन करती हैं . संपर्क : ई-मेल : anitachy04@gmail.com    अन्धकार चारों तरफ धुएं से घिरे बादल और घने और...

औरत ’चुप‘ रहे, तभी ’महान‘ है

सुधा अरोड़ा  आज स्त्रीकाल के पाठकों के लिए सुधा अरोड़ा की एक छोटी सी टिप्पणी जो १९९७ में जनसत्ता में छपी थी . यह टिप्पणी...

साहित्य में स्त्रियों की भागीदारी

जयश्री रॉय ( जय श्री राय हिन्दी कथा साहित्य में एक मह्त्वपूर्ण उपस्थिति हैं. साहित्य में स्त्रियों की भागीदारी जयश्री राय नामक यह आलेख इन्होंने  स्त्रीकाल ,...

बिहार बंद तस्वीरों में: राकेश रंजन की कविता के साथ

स्त्रीकाल डेस्क  जनाक्रोश रंग ला रहा है. बिहार सरकार जनता की नजरों में कटघरे में है तो सुप्रीमकोर्ट इस मामले में स्वतः-संज्ञान लेते हुए केंद्र...

हाशिए की पीड़ा की शाश्वत अभिव्यक्ति : ‘मैं साधु नहीं’

डॉ. विमलेश शर्मा राजकीय कन्या महाविद्यालय अजमेर, राजस्थान  में हिन्दी की प्राध्यापिका. संपर्क : vimlesh27@gmail.com समय शाश्वत है औऱ इसके साथ- साथ सहमतियाँ और प्रतिरोध चलते...

तुम और अन्य कविताएँ

मीनाक्षी भालेराव  राष्ट्रीय मानवाधिकार सुरक्षा संघ , पुणे में महिला अध्यक्ष पद पर कार्यरत.प्रकाशित पुस्तकें : हम नन्हें मुन्ने,पथ का राही ,आओ तुम्हें जगा दूँ....
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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