क्या पुरुष अपने समदुखी ‘मीत’ की व्यथा -कथा समानुभूति से लिखेंगे ?

सुधा अरोड़ा सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स ,...

“चकरघिन्नी” : तीन तलाक़ का दु:स्वप्न

नूर जहीर 'डिनायड बाय अल्लाह' और 'अपना खुदा एक औरत' जैसी चर्चित कृतियों की रचनाकार संपर्क : noorzaheer4@gmail.com. कॉमन सिविल कोड और तीन तलाक की बहस...

सुमंत की कविताएँ

सुमंत सुमंत। बेहद अचर्चित नाम। साहित्य समाज तथा राजनीति में तकरीबन तीन दशकों की गहरी सक्रियता। दिल्ली में पिपुल्स पब्लिशिंग हाउस के हिंदी संपादकीय...

वेश्यावृत्ति का समुदायिकरण और उसका परंपरा बनना

राहुल  सेक्स वर्क (sex work) विशेषकर वेश्यावृत्ति (prostitution) समाज के यौनिक संगठन में ‘यौनिक आनंद’ की एक विशेषीकृत संस्था के बतौर मौजूद रहा है। वेश्यावृत्ति...

‘लिखो इसलिए’ व श्रीदेवी की अन्य कविताएं

भाषाकितना अच्छा होता कि तुम्हारा भी अस्तित्व होता श्रीदेवी छत्तीसगढ़ रायपुर में रहती हैं. पिछले एक...

संतोष अर्श की कविताएं : स्त्री

संतोष अर्श शोधार्थी गुजरात केंद्रीय विश्वविद्याल संपर्क- poetarshbbk@gmail.com निवेदन तुम मुझमें उतनी ही हो जितना मैं ख़ुद में हूँ न रत्ती भर कम न रत्ती भर ज़्यादा. इसीलिए नाभिनाल...

हिन्दी आलोचना में स्त्री के प्रति संवेदना नहीं है: सविता सिंह

रेखा सेठी   हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर. विज्ञापन डॉट कॉम सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचनात्मक और...

लाजवन्ती

प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष . आलोचना और कहानी लेखन  संपर्क:09480226677 लाजवन्ती....!!  हाॅं ... उसका नाम लाजवन्ती था...

बिना इजाज़त अन्दर आना मना है

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क: mamushu46@gmail.com  वर्जीनिया वुल्फ की किताब  ‘ A Room of One's Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था,...

आवाज़ और अन्य कविताएं

अनुपमा तिवाड़ी कविता संग्रह “आइना भीगता है“ 2011 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित. संपर्क : anupamatiwari91@gmail.com उसका नाम तेज है  वह औरत देखती है सुनती है बोलती है लड़ती है, अन्याय...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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