अपर्णा अनेकवर्णा की कवितायें

1. एक ठेठ/ढीठ औरत सुबह से दिन कंधे पे है सवार उम्मीदों की फेरहिस्त थामे इसकी.. उसकी.. अपनी.. सबकी.. ज़रूरतें पूरी हो भी जाएँ.. उम्मीदें पूरी करना बड़ा भारी...

दमदार

सुशीला टाकभौरे ( सुशीला टाकभौरे की यह कहानी दलित स्त्रीवादी कहानी के दायरे में पढी जा सकती है. आज भी सरकारी फाइलों में 'अपराधी जाति'...

जीवन और मृत्यु के बीच अस्तित्व की तलाश

रामजी यादव ( रामजी यादव यहां सुधा अरोडा की कहानियों से गुजरते हुए स्त्री की पीडा , उसके संघर्ष , पितृसत्ता का स्त्री के ऊपर...

अल्पना मिश्र की 5 कवितायें

(अल्पना मिश्र की अधिकांश कहानियां निम्न मध्यमवर्गीय परिवेश की लडकियों /पात्रों की पीडा और संघर्ष की कहानियां होती हैं. आज उनका जन्मदिन है उनके जन्मदिन पर...

हलवा, कपड़े और सियासत

संदीप मील  ( संवादों में गुंथी यह कहानी संदीप मील के कहन की एक अच्छी मिसाल है. यह कहानी बिना अतिरिक्त शोर के स्त्रीवादी कथन के कारण...

* जब अपने संकल्प के साथ एक निर्भ्रान्त जीवन शुरू किया… *

(भारतीय भाषाओं से दलित कवयित्रियों की कवितायें ) अनुवाद और प्रस्तुति  : फारूक शाह  एक काम के दौरान भारतीय दलित स्त्री लेखन का संकलन और उसकी पड़ताल...

साहित्य में स्त्रियों की भागीदारी

जयश्री रॉय ( जय श्री राय हिन्दी कथा साहित्य में एक मह्त्वपूर्ण उपस्थिति हैं. साहित्य में स्त्रियों की भागीदारी जयश्री राय नामक यह आलेख इन्होंने  स्त्रीकाल ,...

मुकेश मानस और दीप्ति की कवितायें

    (  मुकेश मानस कवि, कथाकार और विचारक हैं , चर्चित पत्रिका मगहर का संपादन करते हैं  और दिल्ली वि वि में हिन्दी के प्राध्यापक...

स्त्री-सत्ता : यथार्थ या विभ्रम

अर्चना वर्मा हम सब जानते हैं कि शब्दों के अर्थ उनके प्रयोग-सन्दर्भ से निर्धारित होते हैँ। सत्ता का प्राथमिक अर्थ विद्यमानता, वर्तमानता, उपस्थिति, मौजूदगी या होना यानी...

स्त्री रचनाधर्मिता के तीन स्वर

( इन तीन कवयित्रियों की कविताओं से गुजरना पीडा की एक समान भावभूमि से गुजरना तो है ही लेकिन अलग -अलग सामाजिक स्थितियां और...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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