आचार्य श्रीराम शर्मा और स्त्री शिक्षा

आचार्यश्री का मानना था कि लड़कियों को केवल किताबी शिक्षा देने भर से काम नहीं चलेगा। बल्कि लड़कियों को स्वालम्बन की शिक्षा देनी होगी ताकि आधी आबादी अपने पैरों पर खड़ी हो सके। उनका सोचना था कि- ‘‘लड़कियों की शिक्षा के सम्बन्ध में कुछ नये सिरे से विचार करना पड़ेगा क्योंकि बच्चों की, घर गृहस्थी की जिम्मेदारी सँभालते हुए घर छोड़कर अन्यत्र कठिनाई में ही जा सकती हैं। उन्हें ऐसे ही उद्योग सीखने चाहिए, जिन्हें घर रहते हुए सहायक धन्धे के रूप में आसानी से सम्पन्न किया जा सके’’

‘कागज पर लगाए गए पेड़’ सी जीवंत कविताएँ

स्त्री के मौन में उसके उत्पीड़न का इतिहास छिपा है . शारीरिक अत्याचार, शोषण, हिंसा, क्रूरता की कथाएँ स्त्री उत्पीड़न की स्थिति बयान करती हैं. स्त्री की सहनशीलता ने उत्पीड़कों को सर्वदा बल दिया है. इसलिए संध्या कहती हैं- ‘‘ अतीत ठीक नहीं था औरत का /परंतु भविष्य / मैंने ठान लिया है कि मैं अपनी बेटी को बोलना सिखाउंगी.’ दलित आंदोलन के भीतरी चरित्र पर प्रश्नचिह्न खड़ा करते हुए वे अपनी कलम की ताकत को दर्शाती हैं- ‘‘कर क्या रहे हैं हम/ धरना, मोर्चा, निर्देशन, निवेदन / अथवा / सबकी नजर बचाकर भीतर ही भीतर / किया गया सेटलमेंट.’’

बीबीसी में जातिगत भेदभाव (आरोप)

"आप ही मीना हो?" "हां, क्यों क्या हुआ?" "नहीं कुछ नहीं, बस ऐसे ही." "आपने इस तरह अचानक पूछा..? आप बताइए न किसी ने कुछ कहा क्या?" "नहीं, नहीं कुछ ख़ास नहीं." (थोड़ी देर बात कर उन्हें विश्वास में लेने के बाद) "बताइए न मैं किसी को नहीं बताऊंगी." "मुझसे किसी ने कहा था कि अब तो आपके लोग भी हमारे साथ बैठ कर काम करेंगे." ----------------------- यह सुन मैं थोड़ी देर शांत बैठ गई. मैंने उनसे जब पूछा कि आपको ये किसने कहा तो उन्होंने बताने से मना कर दिया. बीबीसी में मेरी नौकरी करने के ऊपर की गई यह टिप्पणी किसने बताई, मैं उनका नाम जगजाहिर नहीं करना चाहती क्योंकि मैं नहीं चाहती मेरी वज़ह से किसी की नौकरी ख़तरे में पड़ जाए. लेकिन बताना चाहूंगी वो व्यक्ति दलित समुदाय से आते हैं और वे पत्रकार नहीं हैं. वो बीबीसी के दफ़्तर में एक साधारण कर्मी हैं.

माहवारी का ब्योरा नौकरी के लिए क्यों जरूरी (?) : बेड़ियां तोडती स्त्री: नीरा...

“जब हम भारतीय महिलाओं के लिए समान अधिकारों की संवैधानिक गारंटी प्राप्त करने के लिए आगे बढ़...

नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली अफ्रीकी-अमेरिकी महिला–टोनी मॉरिसन

राजीव सुमन टोनी मॉरिसन को सामजिक मुद्दों पर अपनी सूक्ष्म और स्पष्ट दृष्टिकोण रखने के साथ-साथ उनके तीक्ष्ण शब्द...

प्रलेस की एक सदस्या की खुली चिट्ठी :पितृसत्ता के खिलाफ हर लड़ाई में हम...

आरती संजीव जी, इस मुद्दे को आप मुझे व्यक्तिगत भी भेजते रहे हैं, काफी दिनों से पढ़ रही...

स्त्री-पुरूष सहजीवन और प्रेम का प्राचीन स्वरूप

स्त्री-पुरूष संबंध के प्राचीन स्वरूप को समाज में स्त्री-पुरूष के बीच पनप रही नवीन संबंध की व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। और समाज में सहजीवन संबंध के तेजी से बढ़ते उदाहरण, कानून द्धारा प्राप्त सहमति समाज में स्त्री-पुरूष संबंध की एक सकारात्मक परिवर्तन की दिशा देने के संदर्भ में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। नीजि संपत्ति और स्त्री पर पुरूष के आधिपत्यस्वरूप एकविवाह प्रथा की शुरूआत हुई। विवाह स्त्री-पुरूष संबंध का कृत्रिम व सुनियोजित आधार बना ना कि स्वाभाविक संबंध। जबकि सहजीवन स्त्री-पुरूष प्रेम और सहयोग के कारण उत्पन्न स्वाभाविक संबंध था।

लेखक संगठनों को समावेशी बनाने के सुझाव के साथ आगे आये लेखक: प्रलेस से...

पिछले कुछ दिनों से लेखिकाएं और लेखक प्रगतिशील लेखक संगठन की कार्यप्रणाली और उसमें ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक वर्चस्व पर सवाल उठ रहे...

कश्मीर के आईने में शेष भारत का विकास और मर्दवादी चेहरा

लेकिन कोई बात नहीं। जब भक्त लोग कब्जा जमा लेंगे तो यहाँ की महिलाओं की हालत भी आप जैसी हो जाएगी। स्वर्ग को नर्क बनाने मे ज़्यादा वक़्त थोड़ी लगता है।

वैवाहिक बलात्कार और हिंसा: एक अध्ययन

राजलक्ष्मी एक पति अपनी पत्नी का बलात्कार कैसे कर सकता है? वैवाहिक बलात्कार की जब भी बात होती है तो यह सवाल...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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