दलितस्त्रीवाद

एक सांस्कृतिक आंदोलन के चार साल

प्रमोद रंजन व रवि प्रकाश ( देश में एक धीमा सांस्कृतिक आन्दोलन करवट ले रहा है , एक क्रांति घटित हो रही है , जिसकी...

दलित महिला कारोबारी का संघर्ष

'स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत दलित महिला कारोबारी के संघर्ष और उनकी उपलब्धियों से रू-ब-रू करा रहे हैं  पत्रकार नितिन राउत. कमानी ट्यूब्स  की...

बहुजन आंदोलन की समर्पित शख्सियत: मनीषा बांगर

स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत आज मिलते हैं बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनीषा बांगर से. उनके जीवन और विचार उत्पल कान्त अनीस...

कांशीराम से मायावती तक: दलित राजनीति और दलित स्त्री-प्रश्न

प्रियंका सोनकर  प्रियंका सोनकर  असिस्टेन्ट प्रोफेसर दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय. priyankasonkar@yahoo.co.in दलित राजनीति में महिलाओं की संख्या कम है । दलित राजनीति में कुल मिलाकर...

फिल्म कक्कुज (पखाना) की निर्माता दिव्या भारती किसके निशाने पर ?

कुमुदिनी पति  विवाद , समाज और सियासत, दिव्या भारती अपने गृह-राज्य तमिलनाडु से बाहर रहने के लिए मजबूर कर दी गईं हैं।उनके कुछ करीबी मित्रों के...

‘राष्ट्रहित और आरक्षण’

मुन्नी भारती मुन्नी भारती, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं, सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों में भी सक्रिय हैं . संपर्क :munnibharti@gmail.com आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक न्याय...

जातिवाद का दंश: दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापक को राजधानी में नहीं मिल रहे फ़्लैट

रजनी अनुरागी  पिछले लगभग 10 दिन से किराए पर दो शयनकक्ष वाला फ्लैट देख रही हूं। रोहिणी दिल्ली में डीडीए की और अन्य कई ग्रुप...

एक सपने की मौत/अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शिक्षा संस्थानों में प्रतिभावान दलितों की आत्महत्या

सुधा अरोड़ा सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स ,...

मैला ढोने वाली महिलाओं के लिए प्रधानमंत्री को ख़त

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, मैं आपका नारा..‘सबका साथ सबका विकास’ की तरफ आपका ध्यान ले जाना चाहूंगी कि इस नारे में क्या वे  महिलाएं...

घरेलू कामगार महिलाओं की दीदी: संगीता सुभाषिणी

नवल किशोर कुमार 'स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत घरेलू कामगार महिलाओं को संगठित कर उनके संघर्ष की अगुआई कर रही संगीता सुभाषिणी से...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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