दलितस्त्रीवाद

जाति, जेंडर और क्लास दलित स्त्रीवाद की धूरि

( काफी दिनों तक स्त्रीकाल का अपडेट नहीं हुआ. हम फिर से सक्रिय हैं. पुनः शुरू करते हुए स्त्रीकाल, साउथ एशिया वीमेन इन मीडिया, सेंट्रल यूनिवर्सिटी...

अस्तित्व के प्रश्न खड़े करती दलित स्त्री पात्र

शिप्रा किरण सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग.बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ, संपर्क: kiran.shipra@gmail.com अभिव्यक्ति के तमाम सशक्त माध्यमों में से एक है- सिनेमा. जिसके बहुत गहरे और गंभीर सरोकार हैं....

पेरियार: महिलाओं की आजादी का पक्षधर मसीहा

ललिता धारा  महिला दिवस पर विशेष  पेरियार की मूर्ति को नुकसान पहुंचना समतावादी आंदोलन और विचार के प्रति प्रतिगामियों के गुस्से की बानगी है. आइये आज...

जाति को नकारिये नहीं जनाब: यह जान ले लेती है

ज्योति प्रसाद  चुनाव के बाद राजनीतिक दल अपने मुद्दों का भी मुद्दा बदल लेते हैं। नए नए मुद्दों में मुर्दे वाली सड़ांध होती है। इनका...

सावित्रीबाई फुले वैच्रारिकी सम्मान के बाद लेखिका अनिता भारती का वक्तव्य

स्त्रीवादी पत्रिका स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच ने डा. आंबेडकर के नेतृत्व में नागपुर में 20 जुलाई 1942 को हुए महिला सम्मेलन के 75वें...

मुबारक हो बिहारवासियों, मर गयी चंचल पासवान

स्त्रीकाल डेस्क  2012 में चंचल पासवान और उसकी बहन पर तेज़ाब हमला  हुआ था. हमले में उसका चेहरा झुलस गया था और 28% वह जल...

स्त्रीवाद की ` रिले रेस `में रमणिका गुप्ता का बेटन

नीलम कुलश्रेष्ठ जिंदगी की तनी डोर, ये स्त्रियाँ, परत दर परत स्त्री सहित कई किताबें प्रकाशित हैं. सम्पर्क:  .kneeli@rediffmail.com, स्त्रियों की जागृति  का इतिहास सवा सौ साल...

पतनशील पूर्वप्रेमिका कंगना हाज़िर हो !

नीलिमा चौहान पेशे से प्राध्यापक नीलिमा 'आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. प्रकाशित पुस्तकें: पतनशील पत्नियों के नोट्स, 'बेदाद ए इश्क' (संपादित) संपर्क...

रंगकर्मियों से बलात्कार : क्या बलात्कारी पीड़िता को खुद सही-सलामत वापस छोड़ते हैं? आदिवासी...

विक्रम कुमार  रांची के खूंटी जिले के कोचांग में नुक्कड़ नाटक करने गयीं रंकर्मियों के साथ बलात्कार की घटना ने रंगकर्म की दुनिया और देश...

सावित्रीबाई फुले-स्त्री संघर्षो की मिसाल

सुजाता पारमिता सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831-10 मार्च 1897) के संघर्षो पर आज भारतीय स्त्री संगठनों में चर्चा की जा रही है। लगभग डेढ़ सौ साल...
250FollowersFollow
644SubscribersSubscribe

लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
Loading...