दलितस्त्रीवाद

दलित छात्रा ने की आत्महत्या मोदी सरकार के फैसले को कोर्ट में उसने दी...

नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट यानी नीट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में बहस करने वाली तमिलनाडु के अरियालुर जिले की दलित लड़की अनीथा  ने...

हिंदी साहित्य से झाँकतीं आदिवासी स्त्रियाँ

रीता दुबे शोधर्थी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय , दिल्ली, संपर्क:ईमेल:rita.jnu@gmail.com अगर अपनी बात यशपाल की  दिव्या से शुरू करू तो जो कहना चाहती हूँ उसे...

आदिवासी युवती की हत्या को आत्महत्या करार देने की पुलिसिया साजिश (सामूहिक बलात्कार की...

किसके दवाब में वर्धा, महाराष्ट्र  की पुलिस, महिला एसपी सहित, आदिवासी युवती की हत्या को आत्महत्या करार देने में लगी है? लाश जिस हालत...

सावित्रीबाई फुले : शैक्षिक –सामाजिक क्रान्ति की अगुआ

आज भारत की आद्यशिक्षिका सावित्री बाई फुले का जन्मदिन है. आज के इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए ....

तीन दिनों के लिए नागपुर में जुटेंगे अम्बेडकरी महिला साहित्यकार

सम्बुद्ध महिला संगठन और अखिल भारतीय अम्बेडकरी साहित्य व संस्कृति महामंडल द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का आयोजन सुलोचनाबाई डोंगरे परिसर, दीक्षाभूमि नागपुर में होगा. साहित्य और सरोकार के ऐसे आयोजन महाराष्ट्र के अम्बेडकरी साहित्य को जनता से जोड़ने का भी काम करते हैं

एक साक्षात्कार लंबाणी जनजाति की स्त्रियों से

( कन्नड़ में किया गया यह अध्ययन अंग्रेजों के ज़माने से अपराधी करार दी गई जनजातियों में से एक  लंबाणी जनजाति की स्त्रियों के जीवन...

हवा सी बेचैन युवतियां ‘दलित स्त्रीवाद की कविताएं’

 बेनजीर रजनी तिलक को मै क्रांतिकारी कवयित्री के रूप में देखती हूँ. .इनकी कविताओं में जो बेबाक अभिव्यक्ति का स्वर  है , वह अद्भुत है....

दलित स्त्रियों पर पुलिसिया बर्बरता का नाम है नीतीश सरकार

भागलपुर में विभिन्न मांगो के साथ जिला कलक्टर  ऑफिस के सामने धरने पर बैठी महिलाओं पर पुलिस ने बर्बरता पूर्वक लाठीचार्ज किया  तस्वीरों में बर्बरता...

दलित स्त्रीवाद जैसी कोई अवधारणा नहीं है : तेजसिंह

( मंगलवार का दिन दूसरी परम्परा के लिए कई बुरी खबरों का दिन था . सुबह खबर आई कि ब्लैक अधिकारों के लिए लड़ने...

भगवान! ‘एक कटोरा भात खिला दो बस, भारत में भात नहीं मिला’

ज्योति प्रसाद  शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com स्वर्ग और नरक के बीच भूखी बच्ची वहाँ भी फंस गयी, उम्र 11 साल. क्या...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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