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दलितस्त्रीवाद | स्त्रीकाल | Page 11

दलितस्त्रीवाद

शिक्षा में जातिगत और लिंगगत असमानता

रजनी दिसोदिया साहित्यकार , आलोचक रजनी दिसोदिया मिरांडा हाउस मे हिन्दी की प्राध्यापिका हैं. संपर्क : ई -मेल : rajni.disodia@gmail.com,मोबाईल , मोबाईल :...

प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री

( रानी कुमारी के द्वारा 'प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री' विषय पर आयोजित संगोष्ठी की रपट।  रानी दिल्ली वि वि में शोधरत  हैं....

राजेंद्र यादव के अंतर्विरोध , हंस और दलित स्त्री अस्मिता के सवाल

 मनीषा कुमारी / संजीव चंदन ( ३१ जनवरी को हंस का सालाना आयोजन है हंस के  पुनर्प्रकाशन दिवस और  प्रेमचंद जयन्ती के अवसरपर. राजेन्द्र यादव...

एक साक्षात्कार लंबाणी जनजाति की स्त्रियों से

( कन्नड़ में किया गया यह अध्ययन अंग्रेजों के ज़माने से अपराधी करार दी गई जनजातियों में से एक  लंबाणी जनजाति की स्त्रियों के जीवन...

दलित स्त्रीवाद जैसी कोई अवधारणा नहीं है : तेजसिंह

( मंगलवार का दिन दूसरी परम्परा के लिए कई बुरी खबरों का दिन था . सुबह खबर आई कि ब्लैक अधिकारों के लिए लड़ने...

फैंसी स्त्रीवादी आयोजनों में जाति मुद्दों की उपेक्षा

ज्योत्सना सिद्धार्थ / अनुवाद : रंजना बिष्ट  ( एक स्त्रीवादी आयोजन के बहाने ज्योतसना भारत में ठहर गये स्त्रीवादी आंदोलन और चिंतन की पड्ताल कर...

डॉ. अम्बेडकर का मूल चिंतन है स्त्री चिंतन

अनिता भारती   ( कहानीकार आलोचक व कवयित्री अनिता भारती का यह आलेख उनकी पुस्तक ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ में संकलित...

डा0 अम्बेडकर और स्त्री अधिकार – सुजाता पारमिता

( आज आधुनिक भारत के निर्माता डा बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर की जयंती है . बाबा साहब स्त्री अधिकारों के लिए ठोस पहल लेते रहे ....

दलित स्त्री आंदोलन तथा साहित्य- अस्मितावाद से आगे

स्त्रीकाल के ताजा अंक 'दलित स्त्रीवाद ' में प्रकाशित  बजरंग बिहारी तिवारी का यह आलेख दलित स्त्रीवाद को समझने के  लिए अनिवार्य  पाठ है....

सावित्रीबाई फुले : शैक्षिक –सामाजिक क्रान्ति की अगुआ

आज भारत की आद्यशिक्षिका सावित्री बाई फुले का जन्मदिन है. आज के इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए ....
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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