दलितस्त्रीवाद

जातिवाद का दंश: दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापक को राजधानी में नहीं मिल रहे फ़्लैट

रजनी अनुरागी  पिछले लगभग 10 दिन से किराए पर दो शयनकक्ष वाला फ्लैट देख रही हूं। रोहिणी दिल्ली में डीडीए की और अन्य कई ग्रुप...

‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ (तृतीय) के लिए आवेदन / संस्तुतियां आमंत्रित

स्त्रीकाल के द्वारा तृतीय  'सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान' (तृतीय) के लिए आवेदन / संस्तुतियां  15 दिसंबर  2016 तक आमंत्रित हैं. सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान...

‘डेंजर चमार’ की गायिका गिन्नी माही का प्रतिरोधी स्वर : हमारी जान इतनी सस्ती...

कौशल कुमार   'द डेंजर चमार' अल्बम के माध्यम से गिन्नी  माही के गीतों में  प्रतिरोध की अभिव्यक्ति का अध्ययन: प्रतिरोध के रूप में प्रदर्शन-  असंतोष से...

नागपुर में अखिल भारतीय महिला क्रांति परिषद (1942) का अमृत महोत्सव

डा. बाबा साहेब अम्बेडकर की उपस्थिति में नागपुर में 20 जुलाई 1942 को हुई अखिल भारतीय महिला परिषद का के 75वें  वर्ष में कई...

काली मॉडल रिनी कुजूर का प्रसिद्धि-पूर्व संघर्ष : रंगभेद का भारतीय प्रसंग

ज्योति प्रसाद  शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com   छत्तीसगढ़ के एक गाँव की लड़की रातोरात इन्टरनेट पर छा गई है. इसकी वजह बहुत...

दलित स्त्रियों पर पुलिसिया बर्बरता का नाम है नीतीश सरकार

भागलपुर में विभिन्न मांगो के साथ जिला कलक्टर  ऑफिस के सामने धरने पर बैठी महिलाओं पर पुलिस ने बर्बरता पूर्वक लाठीचार्ज किया  तस्वीरों में बर्बरता...

मुबारक हो बिहारवासियों, मर गयी चंचल पासवान

स्त्रीकाल डेस्क  2012 में चंचल पासवान और उसकी बहन पर तेज़ाब हमला  हुआ था. हमले में उसका चेहरा झुलस गया था और 28% वह जल...

इकाई नही मैं करोड़ो पदचाप हूँ मैं: रजनी तिलक की काव्य-चेतना

अनिता भारती  रजनी तिलक  होतीं तो आगामी 27 मई को 60वां सालगिरह मना रही होतीं. पिछले 30 मार्च 2018 को उनका परिनिर्वाण हो गया. प्रथमतः सामाजिक...

महावारी से क्यों होती है परेशानी

आरती रानी प्रजापति  महावारी हर स्त्री के 10-14 की आयु में शुरू होने वाला नियमित चक्र है| जिसमें स्त्री की योनि से रक्त का स्त्राव...

दलित लेखिका की दावेदारी: अपनी जमीं अपना आसमाँ

आत्मकथा में दूसरा महत्वपूर्ण चरित्र है ‘भाई जी’ यानि लेखिका रजनी तिलक के पिता। लेखिका के पिता जुझारू, अत्यंत मेहनती, परिस्थितियों के शिकार, अपनी दिमागी रुप से बीमार पत्नी के प्रति समर्पित पति और एक जिम्मेदार पिता के रूप में सामने आते है।
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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