दलितस्त्रीवाद

‘तिवाड़ी परिवार’ में जातिभेद और छुआछूत बचपन से देखा

हमारी संस्था ने इसी समाज की बालिकाओं के छह – छह महीने के दो आवासीय शिविर किए. शिविर के समापन समारोह में प्रोफेसर श्यामलाल जैदिया को भी आमंत्रित किया. उन्होंने अपने उद्बोधन में बताया कि मैं भी आपके ही समाज से हूँ लेकिन मेहनत करके आज जोधपुर यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर पद से रिटायर हुआ हूँ. बचपन में मैं इसी यूनिवर्सिटी में मेरी माँ के साथ मैला ढोने (शौचालय साफ़ करने) जाता था.

संघर्ष और सफलता की कड़ी

डॉ. कौशल पंवार आज के दिन मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरु महाविद्यालय के संस्कृत विभाग में ज्वाइन किया था, पूरे बारह बरस आज...

माई साहब (सविता अम्बेडकर) पीठ की स्थापना

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय माई साहेब यानी सविता अम्बेडकर के नाम पर एक पीठ की स्थापना करने जा रहा है। ऐसा खुलासा पहली...

केरल के महान दलित नायक ‘अय्यन काली’

बाबू राज के नायर दलितों के उद्धार की बात आते ही केरल के एक महान समाज सुधारक की याद ताजा हो आती हैं। अस्पृश्य मानकर...

मेरे हमदम मेरे दोस्त ( पहली किस्त ) : रजनी दिसोदिया

रजनी दिसोदिया  दलित पुरुष के लेखन में स्त्री इस मुद्दे पर दलित स्त्री विमर्श प्राय: उत्तेजित और आवेशमयी मुद्रा में रहता आया है। वास्तव में यह...

मेरे हमदम मेरे दोस्त ( दूसरी किस्त ) : रजनी दिसोदिया

रजनी दिसोदिया कहानी कार मुकेश मानस की कहानियों को पढ़ने के बाद स्त्री के पक्ष में स्थितियाँ चाहे बहुत बेहतर न हों पर यह उनकी...

स्त्री विमर्श की वैचारिकी में मील पत्थर है ‘बधिया स्त्री’

ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह (शोधार्थी)     आज हम लोग जिस समाज में रह रहे हैं, उसमें समाज के उपेक्षित वर्गों के हित के पक्ष में...

हिंदू कोड बिल और डॉ. अंबेडकर

डॉ. अंबेडकर राजनीति के आकाशगंगा के ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं जिनकी छवि कालांतर में भी धूमिल नहीं हो...

चाकली अइलम्मा : आंध्र प्रदेश की क्रांतिकारी महिला

नरेन्द्र दिवाकर यह मेरी जमीन है, यह मेरी फसल है। है किसी में हिम्मत जो मेरी फसल और मेरी जमीन ले ले? यह तभी...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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