दलितस्त्रीवाद

आदिवासी स्त्री जिसे मीडिया प्रस्तुत नहीं करती है

अंजली मीडिया से अलक्षित आदिवासी स्त्री-छवि और मीडिया द्वारा स्टीरिओटाइप का विश्लेषण कर रही हैं अंजली स्त्री को वैश्विक स्तर पर एक इकाई माना गया है...

इकाई नही मैं करोड़ो पदचाप हूँ मैं: रजनी तिलक की काव्य-चेतना

अनिता भारती  रजनी तिलक  होतीं तो आगामी 27 मई को 60वां सालगिरह मना रही होतीं. पिछले 30 मार्च 2018 को उनका परिनिर्वाण हो गया. प्रथमतः सामाजिक...

दलित स्त्रीवाद अंतरजातीय विवाह को सामाजिक बदलाव का अस्त्र मानता है -रजनी...

दलित स्त्रीवाद की सशक्त प्रवक्ता,  दलित और स्त्री सामाजिक आन्दोलन की प्रखर प्रतिनिधि एवं लेखिका रजनीतिलक से अरुण कुमार प्रियम की बातचीत. यह बातचीत...

भारत में दलित स्त्री के स्वास्थ्य की स्थितियां और चुनौतियाँ

संदीप कुमार मील समाज के किसी भी तबके की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के निर्माण में उसके स्वास्थ्य की स्थितियाँ बहुत निर्णायक भूमिकाएँ...

दलित स्त्रीवाद जैसी कोई अवधारणा नहीं है : तेजसिंह

( मंगलवार का दिन दूसरी परम्परा के लिए कई बुरी खबरों का दिन था . सुबह खबर आई कि ब्लैक अधिकारों के लिए लड़ने...

दलित स्त्री-लेखन का पहला दस्तावेज: मांग महारों का दुःख (1855)

मुक्ता सालवे/अनुवाद: संदीप मधुकर सपकाले  फुले-दम्पति (महात्मा फुले-सावित्री बाई फुले) द्वारा स्थापित देश के पहले बालिका-विद्यालय में मात्र 3 सालों की पढ़ाई के बाद मांग...

हवा सी बेचैन युवतियां ‘दलित स्त्रीवाद की कविताएं’

 बेनजीर रजनी तिलक को मै क्रांतिकारी कवयित्री के रूप में देखती हूँ. .इनकी कविताओं में जो बेबाक अभिव्यक्ति का स्वर  है , वह अद्भुत है....

क्यों चुनी गई अनिता भारती की किताब ‘समकालीन नारीवाद : दलित स्त्री का प्रतिरोध”...

निर्णायक मंडल की ओर से अर्चना वर्मा  निर्णायक मंडल ( 2016)  के सदस्य :  अर्चना वर्मा, सुधा अरोड़ा, अरविंद जैन, सुजाता पारमिता, हेमलता माहिश्वर, परिमला...

समग्र क्रांति का स्वप्न: अखिल भारतीय दलित महिला सम्मेलन

निशा शेंडे स्त्री अध्धयन विभाग अमरावती 'विश्वविद्यालय' में प्राध्यापिका shende_nisha7@yahoo.com 20 जुलाई 1942 को पहला अखिल भारतीय दलित  महिला फेडरेशन की परिषद संपन्न हुई. यह वर्ष हम...

बहुजन आंदोलन की समर्पित शख्सियत: मनीषा बांगर

स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत आज मिलते हैं बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनीषा बांगर से. उनके जीवन और विचार उत्पल कान्त अनीस...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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