दलितस्त्रीवाद

‘डेंजर चमार’ की गायिका गिन्नी माही का प्रतिरोधी स्वर : हमारी जान इतनी सस्ती...

कौशल कुमार   'द डेंजर चमार' अल्बम के माध्यम से गिन्नी  माही के गीतों में  प्रतिरोध की अभिव्यक्ति का अध्ययन: प्रतिरोध के रूप में प्रदर्शन-  असंतोष से...

भारत में दलित स्त्री के स्वास्थ्य की स्थितियां और चुनौतियाँ

संदीप कुमार मील समाज के किसी भी तबके की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के निर्माण में उसके स्वास्थ्य की स्थितियाँ बहुत निर्णायक भूमिकाएँ...

वे कुन्तियाँ नहीं गौरव से भरी माँ हैं

संजीव चंदन  वह कहती है, "मैं विकलांग हूँ, मेरा बच्चा ही मेरा सहारा होने वाला था, इसलिए मैंने निर्णय लिया कि मैं उसे जन्म दूंगी....

नागौर, राजस्थान में दलित दमन

बजरंग बिहारी तिवारी बजरंग बिहारी तिवारी हिंदी के प्रसिद्द आलोचक हैं।  दलित मुद्दों पर इनकी प्रतिबद्धता जगजाहिर है और यही इनके आलोचकीय व्यक्तिव की...

खैरलांजी के एक दशक के बाद भी बदस्तूर जारी है शोषण….

रजनी तिलक  (महाराष्ट्र  में 10 वर्ष पूर्व घटित हुए  सबसे  वीभत्स दलित उत्पीडन कांड को  याद करते हुए रजनीतिलक इन 10 सालों में सामाजिक और...

डा0 अम्बेडकर और स्त्री अधिकार – सुजाता पारमिता

( आज आधुनिक भारत के निर्माता डा बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर की जयंती है . बाबा साहब स्त्री अधिकारों के लिए ठोस पहल लेते रहे ....

बाहर और घर, दोनो मोर्चों पर जिसने स्त्रीवादी संघर्ष किया

राजनीतिलक  स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की नेता, दलित लेखक संघ की संस्थापक सदस्य, सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय राजनीतिलक...

दलित महिलाएं और पत्रकारिता

सुशीला टाकभौरे   चर्चित लेखिका. दो उपन्यास. तीन कहानी संग्रह , तीन कविता संग्रह सहित व्यंग्य,नाटक, आलोचना की किताबें प्रकाशित. संपर्क :9422548822 दलित साहित्य के विषय...

दलित स्त्री आंदोलन तथा साहित्य- अस्मितावाद से आगे

स्त्रीकाल के ताजा अंक 'दलित स्त्रीवाद ' में प्रकाशित  बजरंग बिहारी तिवारी का यह आलेख दलित स्त्रीवाद को समझने के  लिए अनिवार्य  पाठ है....

समानित हुई ‘ महिषासुर की बेटी’ ( राष्ट्रपति ने दिया ‘नारी शक्ति सम्मान’)

संजीव चंदन महिला दिवस, 8 मार्च 2016 को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने बिहार के नवादा जिले की डा. सौरभ सुमन को जब ‘ नारी शक्ति’...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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