दलितस्त्रीवाद

अभी तो बहुत कुछ शेष था ! (रजनी तिलक का असमय जाना)

संजीव चंदन अलग-अलग सरोकारों के लोग, वामपंथी लेखक और एक्टिविस्ट, अम्बेडकरवादी लेखक और एक्टिविस्ट, सामाजिक संस्थाओं के लोग, महिला अधिकार के कार्यकर्ता, एलजीबीटी समूह की...

स्त्रीवाद की ` रिले रेस `में रमणिका गुप्ता का बेटन

नीलम कुलश्रेष्ठ जिंदगी की तनी डोर, ये स्त्रियाँ, परत दर परत स्त्री सहित कई किताबें प्रकाशित हैं. सम्पर्क:  .kneeli@rediffmail.com, स्त्रियों की जागृति  का इतिहास सवा सौ साल...

पेरियार: महिलाओं की आजादी का पक्षधर मसीहा

ललिता धारा  महिला दिवस पर विशेष  पेरियार की मूर्ति को नुकसान पहुंचना समतावादी आंदोलन और विचार के प्रति प्रतिगामियों के गुस्से की बानगी है. आइये आज...

तुलसीराम की बेटी ने लिखा राधादेवी को खत , एक शोधार्थी पर उठाई उंगली

पिछले कुछ दिनों से लेखक, चिंतक दिवंगत तुलसीराम के बाल-विवाह, और उससे उनकी पत्नी के हक को लेकर सोशल मीडिया पर हंगामा बरपा है....

दलित स्त्री-लेखन का पहला दस्तावेज: मांग महारों का दुःख (1855)

मुक्ता सालवे/अनुवाद: संदीप मधुकर सपकाले  फुले-दम्पति (महात्मा फुले-सावित्री बाई फुले) द्वारा स्थापित देश के पहले बालिका-विद्यालय में मात्र 3 सालों की पढ़ाई के बाद मांग...

सजर्नर ट्रुथ : क्या पश्चिम की इस सावित्रीबाई को आप जानते हैं?

 प्रेमकुमार मणि  प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं. संपर्क : manipk25@gmail.com प्रेमकुमार मणि भारतीय उपमहाद्वीप के...

जाति को नकारिये नहीं जनाब: यह जान ले लेती है

ज्योति प्रसाद  चुनाव के बाद राजनीतिक दल अपने मुद्दों का भी मुद्दा बदल लेते हैं। नए नए मुद्दों में मुर्दे वाली सड़ांध होती है। इनका...

भगवान! ‘एक कटोरा भात खिला दो बस, भारत में भात नहीं मिला’

ज्योति प्रसाद  शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com स्वर्ग और नरक के बीच भूखी बच्ची वहाँ भी फंस गयी, उम्र 11 साल. क्या...

नागपुर में अखिल भारतीय महिला क्रांति परिषद (1942) का अमृत महोत्सव

डा. बाबा साहेब अम्बेडकर की उपस्थिति में नागपुर में 20 जुलाई 1942 को हुई अखिल भारतीय महिला परिषद का के 75वें  वर्ष में कई...

बाबा साहेब डा. अम्बेडकर की पत्नी (माई साहेब) को बदनाम किया नेताओं ने:रामदास आठवले

केन्द्रीय सामाजिक  न्याय और अधिकारिता मंत्री  (राज्य) रामदास आठवले ने कहा कि "नेताओं ने जानबूझ कर माई साहब को बदनाम करने की कोशिश की.  बाबा साहब...
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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