पितृसत्ता

अभी तक रॉड, तेज़ाब, मोमबत्ती और अब औरत के गुप्तांग में सिगरेट भी: सोशल...

स्त्रीकाल डेस्क  इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक सोशल मीडिया में अपने विरोध के बावजूद अमेज़न इंडिया ने  महिलाओं  के यौन अंग को टार्गेट कर...

यहाँ सेक्स बिकता है, सेक्स क़त्ल करता है: बदनाम नहीं, ये मर्दों की गलियाँ...

संजीव चंदन यह समाज की पितृसत्तात्मक संरचना ही है, जो यह सुनिश्चित करता है कि सेक्स और सेक्स की संभावनाएं, दोनो ही बिकती हैं. यह...

सृजन की ताक़त रखने वाली महिलाओं से दुनिया की संस्कृतियाँ क्यों डरती हैं !

राजीव सुमन रजस्वला होने की उम्र की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में के प्रवेश-निषिद्ध के संदर्भ...

व्यावसायिक जोखिम का लैंगिक विमर्श

2010 में मैंने सुप्रीम कोर्ट में सूचना अधिकार के एक आवेदन किया था और टाल मटोल के बाद पता चला कि वहां यौन उत्पीडन...

औरत , विज्ञापन और बाजार

अदिति शर्मा केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, बैंगलोर पीठ में हिंदी अनुवादक संपर्क-ई-मेल : aditisharmamystery@gmail.com अदिति शर्मा स्त्री  मुक्ति चेतना व स्त्रीवादी दृष्टिकोण पर बहुत कुछ लिखा जा...

जब पक्ष-विपक्ष के लोगों ने महिला विधायक पर की द्विअर्थी टिप्पणियाँ ( बिहार विधानसभा...

दिव्या  श्री इंदर सिंह नामधारी : माननीय अध्यक्ष महोदय, विरोधी दल में एक ही महिला सदस्य हैं उनको भी यह सरकार संतुष्ट नहीं कर पा...

मीसा भारती: महिलाओं को अधिकार दिये बिना सामाजिक न्याय अधूरा

डा. मीसा भारती डा. मीसा भारती राज्यसभा सांसद हैं .  राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय जनता दल की प्रभावशाली महिला नेता डा. मीसा भारती...

माहवारी में हिमाचली महिलाएं नारकीय जीवन को मजबूर!

टीना हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है लेकिन फिर भी भले ही बदलते युग में समाज महिलाओं और...

आदिवासी स्त्री जिसे मीडिया प्रस्तुत नहीं करती है

अंजली मीडिया से अलक्षित आदिवासी स्त्री-छवि और मीडिया द्वारा स्टीरिओटाइप का विश्लेषण कर रही हैं अंजली स्त्री को वैश्विक स्तर पर एक इकाई माना गया है...

बेडटाइम स्टोरीज : ‘ स्वीट ड्रीम्स’: सेक्स पोर्न और इरॉटिका का ‘साहित्य’ बाजार -2

अर्चना वर्मा अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : जे-901, हाई-बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डेन, अहिंसा खण्ड-2, इन्दिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014, इनसे इनके...
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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