होली पर पिंजडा खोलो ऋचा : अनुपम सिंह की चिट्ठी

( इलाहाबद विश्वविद्यालय के छात्र संघ की पहली महिला अध्यक्ष को विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा का पत्र )  प्रिय ऋचा,  मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय की भूतपूर्व छात्रा...

सरोगेसी (विनियमन) विधेयक का बहिष्कारी चरित्र

सरोगेट स्‍त्री के गर्भ में इस संवर्धित भ्रूण को स्‍थापित करना तो इस पूरी प्रक्रिया का सबसे अंतिम चरण होता है। अत: सरोगेसी के विनियमन से पहले तो सरकार को प्रजनन सहायक प्रौद्योगिकी विधेयक (असिस्‍टेड रिप्रोडक्टिव टेक्‍नोलॉजी विधेयक) को पारित करवाना चाहिए था जो लंबे समय से ठंडे बस्‍ते में पड़ा हुआ है। इस विधेयक को कानून का रूप देना बहुत जरूरी है ताकि प्रजनन सहायक प्रौद्योगिकी से जुड़े अपराधों पर रोक लग सके।

लेखकीय नैतिकता और पाठकों से विश्वासघात!

सुधांशु गुप्त   'मेरे विश्वासघात' (हंस 2004) के लेखक रामशरण जोशी की अनैतिक, एक और विश्वासघात से भरी आत्मकथा 'मैं बोनसाई अपने समय का बोनसाई' राजकमल...

धर्म और स्त्री

निवेदिता मैं कुछ दिनों पहले दिल्ली में एक गोष्ठी में गयी थी। जहां मेरी मुलाकात स्वामी शिवानंद से हुई। उन्हें पर्यावरण के मुद्दे पर अपनी...

दिल्ली में नाइजीरियन यौन- दासियाँ

OLUTOSIN OLADOSU ADEBOWALE OLUTOSIN OLADOSU ADEBOWALE  स्त्री अधिकार कार्यकर्ता हैं, नागारिक पत्रकार हैं. वे बच्चों पर यौन हिंसा के खिलाफ काम करती हैं...

स्त्री की अपनी जगह

शीला रोहेकर यहूदी मूल की हिन्दी की वरिष्ठ रचनाकार शीला रोहेकर लखनउ रहती . संपर्क : .05222308102 ( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी...

औरत को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी

सृष्टि की रचना के आरम्भ में समाज के संचालन की जिम्मेदारी स्त्री-पुरूष दोनों को समान रूप से थी। उसे एक साथ मिलकर चलाने और...

हम क्रूर और कामातुर पूर्वजों की संतानें हैं:क्रूरता की विरासत वाले देश में विधवाओं...

किन्तु, एक बार मैंने भी यह बात एक हिंदू के मुंह से सुनी थी। उसने खुलकर कहा था-‘हम अपनी पत्नियों को अक्सर इसलिए, दुःखी रखते हैं, क्योंकि हमें यह डर रहता है कि कहीं वे हमें जहर न दे दें। इसलिए हमारे ज्ञानी पुरखों ने विधवाओं को भयानक रूप से दंडनीय बनाया था, ताकि कोई भी स्त्री जहर देने का साहस न कर सके।’

मातृसत्तातमक व्यवस्था स्त्रीवादियों का लक्ष्य नहीं है : संजीव चंदन

( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ' निकट ' ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित...

आदिवासी युवती की हत्या को आत्महत्या करार देने की पुलिसिया साजिश (सामूहिक बलात्कार की...

किसके दवाब में वर्धा, महाराष्ट्र  की पुलिस, महिला एसपी सहित, आदिवासी युवती की हत्या को आत्महत्या करार देने में लगी है? लाश जिस हालत...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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