मुसलमान भी नहीं पैदा करना चाहते बेटियां

नासिरूद्दीन हैदर खाँ नासिरूद्दीन हैदर खाँ पेशे से पत्रकार हैं और जेंडर जिहाद के संपादक हैं . ‘..और (इनका हाल यह है कि) जब...

साधु का लिंग महिला ने काटा: पितृसत्ता लहू-लुहान

केरल में एक महिला ने अपने बलात्कारी श्रीहरि उर्फ़ गणेशानंद तीर्थपदा का लिंग काट दिया. इसके बाद महिला ने पुलिस को बताया कि श्रीहरि...

स्त्री, आस्था और धर्म

सविता खान  इस आधुनिक राष्ट्र-राज्य में आधुनिकता और आधुनिक परम्पाओं, (परम्पराओं नहीं) के बीच जंग का एक बेहतरीन नमूना अभी हाल ही में  स्त्रियों  के...

पुरुषों की तुलना में स्त्रियों का नैतिक विकास अधिक : अनामिका

हिन्दी साहित्य में स्त्रीलेखन के भीतर से बहुत कम रचनाकार हैं, जो खुद को स्त्रीवादी रचनाकार क्लेम करती हैं. अनामिका खुद को स्त्रीवादी रचनाकार...

प्रेमरिक्‍त दैहिक सम्‍बन्‍ध निस्‍संदेह अनैतिक होते हैं : कात्यायनी

कात्यायनी कात्यायनी चर्चित कवयित्री एवमऐक्टिविस्ट हैं  . संपर्क : katyayani.lko@gmail.com  ( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ' निकट ' ने...

हर्षिता दहिया की हत्या और न्याय का प्रश्न

प्रियंका हर्षिता दहिया उस समाज की लड़की थी, जहाँ लड़कियों का घर से बाहर निकलना, जींस पहनना, फोन रखना तक बुरी बात समझी जाती है,...

मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ

नासिरुद्दीन तलाक के नाम पर मर्दानगी एसएमएस से तलाक, इ-मेल से तलाक, स्काइप से तलाक, व्हॉट‍्सएप्प से तलाक, नशे की हालत में तलाक, गुस्से में तलाक,...

‘संघियों तुम बलात्कार से पैदा हुए हो’ : क्यों कहा था गौरी लंकेश ने

संघियों, यदि आपकी माँ ने ‘फ्री सेक्स’ यानी ‘अपनी स्वतंत्र इच्छा से सेक्स’ नहीं किया है तो उसके दो मायने हैं.  1. आप बलात्कार से...

बलात्कार के विरोध में आवाज बनी बेला भाटिया को मिली घर छोड़ने की धमकी

बस्तर के आदिवासियों के बीच काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया को कुछ अज्ञात लोगों ने बस्तर छोड़ देने की धमकी दी थी....

इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए

सीमा आज़ाद ये आंखें हैं तुम्हारी तकलीफ का उमड़ता हुआ समन्दर इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए गोरख पाण्डे की ये कविता 16 दिसम्बर से ही बार-बार जेहन...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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