ट्रोजन की औरतें’ एवं ‘स्त्री विलाप पर्व

‘द ट्रोजन विमेन’/ ‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक यूरिपिडीज द्वारा 416 ईसापूर्व में लिखा गया था। यह नाटक यूनान की विजय तथा ट्रॉय की पराजय के कथ्य पर केन्द्रित है। किन्तु इसका मूल कथ्य विजय के पश्चात की घटनाओं से जुड़ा हुआ है। ‘ट्रोजन की औरतें’ युद्ध के पश्चात के उन्माद, पाशविकता, व्यभिचार, हिंसा पर आधारित है। यह नाटक मुख्य रूप से हैक्युबा के विलाप और उस बहाने महान यूनान की सभ्यता पर प्रश्न चिह्न लगाता है। ‘महाभारत’ के ‘स्त्री पर्व’ में विभिन्न प्रकार के ‘विलाप दृश्य’ रखे गए हैं। जैसे धृतराष्ट्र का विलाप, कौरववंश की युवतियों के सामूहिक विलाप। इसके अतिरिक्त विभिन्न अध्याय केवल विलाप की विभिन्न भंगिमाओं के निमित्त रचे गए हैं।

बीबीसी में जातिगत भेदभाव (आरोप)

"आप ही मीना हो?" "हां, क्यों क्या हुआ?" "नहीं कुछ नहीं, बस ऐसे ही." "आपने इस तरह अचानक पूछा..? आप बताइए न किसी ने कुछ कहा क्या?" "नहीं, नहीं कुछ ख़ास नहीं." (थोड़ी देर बात कर उन्हें विश्वास में लेने के बाद) "बताइए न मैं किसी को नहीं बताऊंगी." "मुझसे किसी ने कहा था कि अब तो आपके लोग भी हमारे साथ बैठ कर काम करेंगे." ----------------------- यह सुन मैं थोड़ी देर शांत बैठ गई. मैंने उनसे जब पूछा कि आपको ये किसने कहा तो उन्होंने बताने से मना कर दिया. बीबीसी में मेरी नौकरी करने के ऊपर की गई यह टिप्पणी किसने बताई, मैं उनका नाम जगजाहिर नहीं करना चाहती क्योंकि मैं नहीं चाहती मेरी वज़ह से किसी की नौकरी ख़तरे में पड़ जाए. लेकिन बताना चाहूंगी वो व्यक्ति दलित समुदाय से आते हैं और वे पत्रकार नहीं हैं. वो बीबीसी के दफ़्तर में एक साधारण कर्मी हैं.

लेखक संगठनों को समावेशी बनाने के सुझाव के साथ आगे आये लेखक: प्रलेस से...

पिछले कुछ दिनों से लेखिकाएं और लेखक प्रगतिशील लेखक संगठन की कार्यप्रणाली और उसमें ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक वर्चस्व पर सवाल उठ रहे...

कश्मीर के आईने में शेष भारत का विकास और मर्दवादी चेहरा

लेकिन कोई बात नहीं। जब भक्त लोग कब्जा जमा लेंगे तो यहाँ की महिलाओं की हालत भी आप जैसी हो जाएगी। स्वर्ग को नर्क बनाने मे ज़्यादा वक़्त थोड़ी लगता है।

वैवाहिक बलात्कार और हिंसा: एक अध्ययन

राजलक्ष्मी एक पति अपनी पत्नी का बलात्कार कैसे कर सकता है? वैवाहिक बलात्कार की जब भी बात होती है तो यह सवाल...

लेखिका ने गिनाये प्रगतिशील लेखक संघ के महिला विरोधी निर्णय: संघ सेक्सिस्ट पुलिसवाले के...

उस समय विवाद उठा था कृष्ण कल्पित जी कि कुछ पहले अनामिका जी से कि गई बदतमीजी पर। लेकिन वी॰एन॰ राय भी वहाँ मौजूद थे। वहाँ भी सवाल उठाया था, जवाब मिला, “जब मैत्रेयी पुष्पा जी उत्सव मे मौजूद हैं और उन्हे कोई ऐतराज नहीं तो किसी को क्यों ऐतराज हो ।“ खैर, इस साल जब वे नहीं थे तो हमे लगा कि शायद हमारे कहने का कुछ असर हुआ हो। लेकिन कहाँ साहब ? यहाँ तो वरिष्ठ कवि, मंच से ही महिला विरोधी गाली दे गए और विरोध केवल मैंने और सुजाता ने दर्ज किया । वैसे संबंध हमारे समानान्तर साहित्य उत्सव के सभी आयोजकों से बहुत अच्छे हैं ।

लेखक संगठन (प्रलेस) ने स्त्री अस्मिता पर मर्द दरोगा को दी तरजीह

प्रलेस के इस महिलाविरोधी रवैये से अब महिलाओं को कुछ करना चाहिए। चुप रहने और बर्दाश्त करने की भी एक सीमा होती है। अब कहना ज़रूरी हो गया है। जब सिर्फ ऐतराज और शिकायत दर्ज करने से कोई सुनवाई नहीं हो रही है तो शायद ज्यादा कड़ा कदम उठाना चाहिए। लगता है कि सभी महिला सदस्यों को प्रलेस से सामूहिक इस्तीफा देने जैसा कदम उठाना चाहिए।

मिसोजिनी, नायकत्व और ‘कबीर सिंह’

‘कबीर सिंह’ की कई समीक्षाओं में कबीर को एक ‘रिबेलियस एल्कोहोलिक’ बताया गया है। पर यहाँ सवाल यह उठता है कि अगर फ़िल्म का नायक रिबेल, यानी विद्रोह करता है तो किस के प्रति? अपने परिवार के प्रति? अपने कॉलेज-प्रशासन के प्रति जो उससे अनुशासन की मांग करता है? या फिर एक पिता के प्रति जो अपनी बेटी के लिए उसे अनफ़िट पाता है?

हां उनकी नजर में जाति-घृणा थी, वे मेरे दोस्त थे, सहेलियां थीं

हिंदू ग्रंथों, टेलीविजन, सहित, समाज विज्ञान, सिनेमा ने अबतक आदिवासी को नकारात्मक तौर से पेश किया है. एंथ्रोपोलॉजी और सोशियोलॉजी के विद्वानों ने भी आदिवासियों का स्ट्रियोटाइप गढ़ने में बड़ा रोल अदा किया है.इसी स्टरियोटाइप से ग्रसित ही कर मेरे कॉलेज के दोस्तों ने मेरे साथ टिफिन खाना बंद कर दिया.

बिहार की सावित्रीबाई फुले कुन्ती देवी की कहानी

इस किताब में कुन्ती देवी-केशव दयाल मेहता की पुत्री पुष्पा कुमारी मेहता ने अपने माता-पिता की जीवनचर्या के बहाने भारत के निर्माण की जटिल प्रक्रिया को अनायास तरीके से दर्ज किया है. यह एक ऐसी कहानी है, जो अपनी ओर से कुछ भी आरोपित नहीं करती
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समकालीन स्त्री लेखन और मुक्ति का स्वरूप

रेनू दूग्गल भारतीय समाज में स्त्रियों की ऐतिहासिक स्थिति संतोषजनक नहीं रही यद्यपि वैदिक काल में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति अत्यन्त उन्नत थी। इस काल...
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