क्या सजा के खौफ से तेजाब हमलों को रोका जा सकता है ( !...

संजय स्वदेश संजय स्वदेश जन पक्षधर पत्रकार हैं. संप्रति हरिभूमि में कार्यरत हैं. संपर्क : 99691578252 . ( तेजाब हमले के एक मामले में एक...

और यह स्त्री -पक्षधर हिन्दी समाज है ( !)

(  हिन्दी के एक प्रोफेसर और हिन्दी के आलोचक , जिन्हें प्रतिष्ठित  देवी शंकर अवस्थी सम्मान हासिल है , के द्वारा अपनी पत्नी की...

सोनिया गांधी का नागरिकता प्रसंग : पितृसत्ता का राग-विराग

संजीव चंदन ( २०१४ में टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा को तेलंगाना का ब्रांड अम्बेसडर बनाए जाने पर सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के द्वारा किये जा रहे हंगामे...

राजेंद्र यादव के अंतर्विरोध , हंस और दलित स्त्री अस्मिता के सवाल

 मनीषा कुमारी / संजीव चंदन ( ३१ जनवरी को हंस का सालाना आयोजन है हंस के  पुनर्प्रकाशन दिवस और  प्रेमचंद जयन्ती के अवसरपर. राजेन्द्र यादव...

महिलाएं असुरक्षित, यहां भी और वहां भी

आशीष कुमार ‘‘अंशु’ आशीष कुमार ‘‘अंशु’ देश भर में खूब घूमते हैं और खूब रपटें लिखते हैं . आशीष फिलहाल विकास पत्रिका 'सोपान'...

चाहे नरक में दीजो डार

नासिरूद्दीन हैदर खाँ नासिरूद्दीन हैदर खाँ पेशे से पत्रकार हैं और जेंडर जिहाद के संपादक हैं . ( मुसलमानों के बीच स्त्री -पुरुष के...

सलाखें भीतर और बाहर

प्रो.परिमळा अंबेकर प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं तथा कन्नड़ में हो...

दिल्ली में नाइजीरियन यौन- दासियाँ

OLUTOSIN OLADOSU ADEBOWALE OLUTOSIN OLADOSU ADEBOWALE  स्त्री अधिकार कार्यकर्ता हैं, नागारिक पत्रकार हैं. वे बच्चों पर यौन हिंसा के खिलाफ काम करती हैं...

पश्चिम उत्तर प्रदेश : स्त्री की नियति

प्रेमपाल शर्मा प्रेमपाल शर्मा सामाजिक -सांस्कृतिक चिन्तक हैं.संपर्क: 22744596(घर),23383315(कार्या),Email:prempalsharma@yahoo.co.in, Website www.prempalsharma.com ( प्रेमपाल शर्मा का यह आलेख पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पितृसत्तात्मक समाज के दीर्घकालीन ...

हरियाणा की मनीपुरी बहुएं

अफ़लातून अफलू अफ़लातून समाजवादी चिन्तक हैं . समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय सचिव हैं ,इनसे इनके ई मेल आई डी : aflatoon@gmail.com पर संपर्क किया...
253FollowersFollow
691SubscribersSubscribe

लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
Loading...