विमर्श से परे: स्त्री और पुरुष-पहली किश्त

सुधा अरोडा सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई ,...

हम चार दशक पीछे चले गए हैं :

आयडवा और पी यू सी एल की  अपील ( याद होगा कि महिला आंदोलनों की वजह से महिलाओं के खिलाफ उत्पीडन को लेकर क़ानून सख्त...

यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता: भाग 3

एल.जे. रूस्सुम/ अनुवाद डा अनुपमा गुप्ता (एल .जे .रुस्सुम का यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए भेजा गया था , जिसे हम स्त्रीकाल...

बदलाव की बयार : जद्दोजहद अभी बाकी है

अमृता ठाकुर ( यह आलेख हरियाणा के सतरोल खाप के द्वारा , महिला विंग बनाने , अन्तरजातीय विवाहों को मान्यता देने आदि के फैसलों के...

मर्दों के लिए घर आशियाना और औरतों के लिए जेलखाना है : अरविन्द जैन

( कल ही दिल्ली की एक अदालत ने यह व्यवस्था दी है कि पति के द्वारा जबरन संभोग बलात्कार नहीं है , और दो...

यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता -भाग 2

एल.जे. रूस्सुम/ अनुवाद : डा अनुपमा गुप्ता (एल .जे .रुस्सुम का यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए भेजा गया था , जिसे हम...

यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता

एल.जे. रूस्सुम/ अनुवाद : डा अनुपमा गुप्ता (एल .जे .रुस्सुम का यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए भेजा गया था , जिसे हम...

दाम्पत्य में ‘बलात्कार का लाइसेंस’ असंवैधानिक है

 अरविन्द जैन  ( भारत में नैतिकता और परिवार की पवित्रता और निजी दायरे की आड में विवाह के भीतर बलात्कार के खिलाफ कानून बनाने के...

फैंसी स्त्रीवादी आयोजनों में जाति मुद्दों की उपेक्षा

ज्योत्सना सिद्धार्थ / अनुवाद : रंजना बिष्ट  ( एक स्त्रीवादी आयोजन के बहाने ज्योतसना भारत में ठहर गये स्त्रीवादी आंदोलन और चिंतन की पड्ताल कर...

मनुवादी न्याय का शीर्ष तंत्र

( भगाणा की दलित लड्कियों के साथ बलात्कार के खिलाफ साथियों ने आन्दोलन छेड ही रखा था कि 'योगगुरु' रामदेव ने दलित स्त्रियों के...
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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