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शोध आलेख | स्त्रीकाल

‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ उपन्यास में प्रकृति चित्रण

कस्तूरी चक्रवर्ती  प्रकृति व्यापक अर्थ में, प्राकृतिक, भौतिक या पदार्थिक जगत या ब्रह्माण्ड हैं। प्रकृति का मूल अर्थ ब्रह्माण्ड है। इस ब्रह्माण्ड के एक छोटे...

स्त्री की यौन मुक्ति की लड़ाई, जो प्रो. कर्वे और डा....

संविधान दिवस विशेष  लेखक: राजीव सुमन  स्त्री के लिए यौन-मुक्ति की यह लड़ाई 1934 में प्रोफेसर कर्वे के पक्ष में डा. अम्बेडकर ने लड़ी थी. हालांकि...

क्रूर और हिंसक यथार्थ में प्रेम और करुणा को बचाये रखने की कोशिश...

मीना बुद्धिराजाकविता अपनी संरचना और प्रकृति में तमाम भेद-भावों से परे और लिंग,वर्ण,समुदाय, जाति- वर्ग की अवधारणाओं से मुक्त और आज़ाद रहती है ।...

भिखारी ठाकुर की तुलना शेक्सपियर से करना भिखारी ठाकुर का अपमान है

आँचल  अंग्रेजी साहित्य की शोधार्थी आंचल भिखारी ठाकुर की तुलना शेक्सपियर से किये जाने को भिखारी ठाकुर का  अपमान बता रही हैं. इस टिप्पणी के अनुसार...

‘यौन हिंसा के सन्दर्भ में लज्जित करने की रणनीति’ (यशपाल के झूठा-सच में)

पल्लवी  ‘भीड़ के बीचों बीच नीलाम करने वाला एक जवान लड़की को चुटिया से खींचकर खड़ा किये था. लड़की के शरीर पर कोई कपड़ा ना...

हिंदी साहित्य में आदिवासी महिलाओं का योगदान

 गंगा सहाय मीणा हिंदी साहित्य में आदिवासी महिलाओं के योगदान का मूल्यांकन किया जाना दिलचस्प है क्योंकि आदिवासी लेखन में स्त्री का स्वर प्राथमिक स्वर...

काश ! ऐसी पत्नियाँ, बहनें समाज का अधिकतम सच हो जायें!

ज्योति प्रसाद क्या आपको मदर इण्डिया फिल्म का अंतिम दृश्य याद है? क्या आपको राधा, जिसका किरदार हिंदी सिनेमा की अदाकारा नरगिस ने निभाया था,...

सुप्रीम कोर्ट का दहेज़ संबंधी निर्णय यथार्थ की जमीन पर

अरविंद जैन पिछले दिनों अपने ही एक निर्णय को पलटते हुए सुप्रीमकोर्ट ने दहेज़ के मामलों में जो नयी व्यवस्था दी है, वह स्वागत योग्य...

माहवारी में थोपे गये पापों से मुक्ति हेतु कब तक करते रहेंगी ऋषि पंचमी...

विनिता परमार हिन्दू व्रतों की स्त्रियों और गैर ब्राह्मण समुदायों के प्रति दुष्टताओं को लेकर आयी यह छोटी सी टिप्पणी जरूर पढ़ें. देखें कैसे अशुद्धि,...

बलात्कारी परिवेश में रक्षाबंधन पर एक बहन का नोट्स:

ज्योति प्रसाद अपने समय से कट जाना बड़ा ही मुश्किल काम है. और जो लोग इस तरह से कट जाने में सफल रहते हैं वास्तव में...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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