हिन्दी साहित्य में अस्मितामूलक विमर्श विशेष संदर्भःस्त्री अस्मिता

अजय कुमार यादव अजय कुमार यादव, शोधर्थी , जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली . संपर्क :ajjujnu@gmail.com Mobile no.8882273975 पिछले कुछ दशकों में विचारधारा और चिन्तन की...

मर्दोत्सव और स्त्रीविलाप बीच होलिका का लोकमिथ

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन तथा एक्टिविज्म. सम्पर्क: susheel.manav@gmail.com फोन- 6393491351 अवध वह क्षेत्र है जहाँ से राम की कट्टर मर्यादा पुरुषोत्तम छवि के साथ साथ...

प्रेम, विवाह और स्त्री

रेणु चौधरी जे.एन.यु.में शोधरत है renu.jnu14@gmail.com ‘‘प्रेम व्यक्ति के भीतर एक सक्रिय शक्ति का नाम है। यह वह शक्ति है जो व्यक्ति और दुनिया के बीच...

छायावादी कविता में पितृसत्तात्मक अभिव्यक्ति

मनीष कुमार  भक्तिकाव्य के बाद छायावादी काव्य अपनी युगीन संवेदनशीलता में अद्वितीय है| दो विश्व-युद्धों के बीच के इस युग की यह अद्वितीयता महज़ कैशोर्य...

प्रभा खेतान के साहित्य में स्त्री जीवन का संघर्ष

पंकज कुमार जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में शोधरत है. संपर्क:ssatyarthi39@gmail.com स्त्री विमर्श अपने आप में पुरुष द्वारा थोपी गई जाति के लैंगीकरण  की अमानवीय व्यवस्था के विरूद्ध...

आदिवासी स्त्री जिसे मीडिया प्रस्तुत नहीं करती है

अंजली मीडिया से अलक्षित आदिवासी स्त्री-छवि और मीडिया द्वारा स्टीरिओटाइप का विश्लेषण कर रही हैं अंजली स्त्री को वैश्विक स्तर पर एक इकाई माना गया है...

हिंदी साहित्य में आदिवासी महिलाओं का योगदान

 गंगा सहाय मीणा हिंदी साहित्य में आदिवासी महिलाओं के योगदान का मूल्यांकन किया जाना दिलचस्प है क्योंकि आदिवासी लेखन में स्त्री का स्वर प्राथमिक स्वर...

स्त्री मुक्ति का यथार्थ

कुमारी ज्योति गुप्ता  चूकि कि यह समाज पुरुषप्रधान है इसलिए अधिकांश  स्त्रियां भी पुरुषवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। पुरुषों की मानसिकता को बदलना जितना जरूरी...

जायसी और पद्माकर की नायिकाओं के व्यक्तित्व के सामाजिक पक्ष का तुलनात्मक अध्ययन

आरती रानी प्रजापति जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण में समाज की...

थेरी गाथाओं में अभिव्यक्त मुक्तिकामी स्वर

स्नेह लता नेगी सहायक प्रो. हिन्दी विभाग,दिल्ली विश्वविद्यालय संपर्क:negi.sneh@gmail.com मोबाइल : 8586066430 इक्कीसवीं सदी में समाज के हर क्षेत्र में स्त्री ने अपनी बुद्धि और क्षमता का...
248FollowersFollow
537SubscribersSubscribe

लोकप्रिय

भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
Loading...