सुप्रीम कोर्ट का दहेज़ संबंधी निर्णय यथार्थ की जमीन पर

अरविंद जैन पिछले दिनों अपने ही एक निर्णय को पलटते हुए सुप्रीमकोर्ट ने दहेज़ के मामलों में जो नयी व्यवस्था दी है, वह स्वागत योग्य...

‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ उपन्यास में प्रकृति चित्रण

कस्तूरी चक्रवर्ती  प्रकृति व्यापक अर्थ में, प्राकृतिक, भौतिक या पदार्थिक जगत या ब्रह्माण्ड हैं। प्रकृति का मूल अर्थ ब्रह्माण्ड है। इस ब्रह्माण्ड के एक छोटे...

विज्ञान के क्षेत्र में लडकियां क्यों कम हैं ?

सुशील शर्मा  लड़कियों  भावनात्मक रूप से लड़कों की अपेक्षा ज्यादा मजबूत होती हैं ,किन्तु वे आधुनिक तकनीकी एवं विज्ञान के विषयों की अपेक्षा परम्परागत विषयों...

स्त्री की यौन मुक्ति की लड़ाई, जो प्रो. कर्वे और डा....

संविधान दिवस विशेष  लेखक: राजीव सुमन  स्त्री के लिए यौन-मुक्ति की यह लड़ाई 1934 में प्रोफेसर कर्वे के पक्ष में डा. अम्बेडकर ने लड़ी थी. हालांकि...

दलित स्त्री आंदोलन तथा साहित्य- अस्मितावाद से आगे

स्त्रीकाल के ताजा अंक 'दलित स्त्रीवाद ' में प्रकाशित  बजरंग बिहारी तिवारी का यह आलेख दलित स्त्रीवाद को समझने के  लिए अनिवार्य  पाठ है....

पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण और स्त्री की आजादी विशेष संदर्भ-मैत्रेयी की कहानी “पगला गयी है भागवती”

आदित्य कुमार गिरि शोधार्थी,कलकत्ता विश्वविद्यालय,ईमेल आईडी-adityakumargiri@gmail.com पुंसवादी समाज ने एक ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसके तहत स्त्रियों को दूसरे दर्जे का प्राणी मान लिया...

इस्लाम में हराम परिवार-नियोजन: एक मिथक

हुस्न  तबस्सुम निंहां शोध-सारांश अब तक के समय में जहां भारत ने विभिन्न  क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की है वहीं कुछ समस्याएं आज भी जस की...

लिव-इन- संबंध एवं जातीय संरचना

विकाश सिंह मौर्य दुनिया भर के मुल्कों के बाशिंदों के लिए इक्कीसवीं सदी की शुरुआत भारी झंझावातों के साथ हुई है. इन झंझावातों की पूर्वपीठिका...

छायावादी कविता में पितृसत्तात्मक अभिव्यक्ति

मनीष कुमार  भक्तिकाव्य के बाद छायावादी काव्य अपनी युगीन संवेदनशीलता में अद्वितीय है| दो विश्व-युद्धों के बीच के इस युग की यह अद्वितीयता महज़ कैशोर्य...

डॉ. अम्बेडकर का मूल चिंतन है स्त्री चिंतन

अनिता भारती   ( कहानीकार आलोचक व कवयित्री अनिता भारती का यह आलेख उनकी पुस्तक ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ में संकलित...
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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