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हासिल | स्त्रीकाल

बहुजन भारत के शौर्य-मेधा का प्रतीक बनी हिमा दास

स्त्रीकाल डेस्क  फ़िनलैंड के टैम्पेयर शहर में 18 साल की हिमा दास ने 12 जुलाई को इतिहास रचते हुए आईएएएफ़ विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप की...

मानवाधिकार-प्रहरी सोनी सोरी को मिला अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मान

कमल शुक्ल  वर्ष 2018 का विश्व प्रतिष्ठित मानव अधिकार सम्मान ‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ पाने वालों में भारत की ओर...

इजाडोरा डंकन: नृत्य की महान साम्राज्ञी और स्त्री-स्वतंत्रता की प्रवक्ता!

ज्योति प्रसाद  शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com आज 29 अप्रैल है। आज ही के दिन अंतरराष्ट्रीय  नृत्य दिवस (इंटरनेशनल डांस डे) मनाया जाता...

स्त्रीकाल के साथ पत्रकारिता करें, इंटर्नशिप करें

साथियो, आप कहीं भी हों, किसी भी शहर में, यदि आप जर्नलिज्म के विद्यार्थी हैं या स्त्री अध्ययन और जेंडर स्टडीज के विद्यार्थी हैं, तो...

‘ग्लोबल बहुजन एवार्ड’से सम्मानित हुईं मनीषा बांगर

स्त्रीकाल डेस्क  बामसेफ की उपाध्यक्ष मनीषा बांगर न सिर्फ देश में बल्कि दुनिया भर के बहुजनों के बीच बहुजन-क्रान्ति का बिगुल बजा रही हैं.  पिछले...

सतपुड़ा की वादियों में सक्रिय आदिवासियों की ताई: प्रतिभाताई शिंदे

नीलेश  झाल्टे   महाराष्ट्र में आदिवासियों के बीच उनकी लड़ाई में शामिल प्रतिभाताई शिंदे से महिला-नेतृत्व सीरीज के तहत  परिचित करा रहे हैं  नीलेश  झाल्टे :  आदिवासी समाज...

दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप

दलित पितृसत्ता को भी जिसने चुनौती दी आज सावित्रीबाई फुले की जयंती (3 जनवरी) से हम एक मुहीम शुरू कर रहे हैं-स्त्रीकाल में ‘स्त्री नेतृत्व...

क्या महिला नेतृत्व की खोज की मुहीम में आप हमारे साथ शामिल होंगे?

आजादी के 70 साल बाद भी लोकसभा में आज तक महिलाओं की 12% भागीदारी ही संभव हो पाई है. विभिन्न राज्यों के विधान सभाओं...

दीपा कर्माकर से पीवी सिंधु तक: विपरीत परिस्थितियों में खेल और जीत रही ...

अपने ऊपर देश भर टिकी निगाहों के बीच पीवी सिंधु ने भारत को ओलंपिक में बैडमिन्टन में पहला रजत दिलाया. 21 साल की पीवी...

ओलंपिक में स्त्रीकाल- कर्णम मल्लेश्वरी से लेकर साक्षी मलिक तक

रियो ओलंपिक में दीपा कर्मकार के शानदार प्रदर्शन के बाद साक्षी मलिक ने कांस्य पदक जीतकर भारत का खाता खोल दिया. साक्षी मलिक भारतीय पहलवान साक्षी...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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