महिला मताधिकार के राजनीतिक संदेश

  संजीव चंदन   अन्य देशों की तुलना में भारतीय महिलाएं इस मामले में थोड़ी सुविधाजनक स्थिति में रही हैं कि उन्हें आजादी के बाद से ही पुरुषों के...

एशियाड में स्त्रीकाल: मर्दवादी रूढ़ियों को हराकर महिलाओं ने फहराये परचम

सुशील मानव मर्दवादी रुढ़ियों व आर्थिक-सामाजिक बाधाओं को पारकर भारतीय महिला खिलाड़ियों ने एशियाड के फलक पर दर्ज़ किया अपना नाम इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में...

महिला आरक्षण, स्त्रीवाद पर बातचीत और सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान समारोह

1942 के 20 जुलाई को हुए नागपुर महिला सम्मलेन के 75 वें साल के अवसर पर 29 जुलाई को जेएनयू के 'ट्रिपल एस ऑडिटोरियम'...

मानवाधिकार-प्रहरी सोनी सोरी को मिला अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मान

कमल शुक्ल  वर्ष 2018 का विश्व प्रतिष्ठित मानव अधिकार सम्मान ‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ पाने वालों में भारत की ओर...

क्या महिला नेतृत्व की खोज की मुहीम में आप हमारे साथ शामिल होंगे?

आजादी के 70 साल बाद भी लोकसभा में आज तक महिलाओं की 12% भागीदारी ही संभव हो पाई है. विभिन्न राज्यों के विधान सभाओं...

गूगल का डूडल इस्मत चुगताई के नाम

स्त्रीकाल डेस्क  उर्दू की मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की मंगलवार यानी 21 अगस्त को 107वीं जयंती है, इस मौके पर गूगल ने एक डूडल बनाकर...

अनिता भारती की किताब को ‘ सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान, 2016’ की घोषणा

स्त्रीवादी पत्रिका , ' स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच' के द्वारा वर्ष 2016 के लिए ' सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान'  लेखिका अनिता भारती...

सतपुड़ा की वादियों में सक्रिय आदिवासियों की ताई: प्रतिभाताई शिंदे

नीलेश  झाल्टे   महाराष्ट्र में आदिवासियों के बीच उनकी लड़ाई में शामिल प्रतिभाताई शिंदे से महिला-नेतृत्व सीरीज के तहत  परिचित करा रहे हैं  नीलेश  झाल्टे :  आदिवासी समाज...

दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप

दलित पितृसत्ता को भी जिसने चुनौती दी आज सावित्रीबाई फुले की जयंती (3 जनवरी) से हम एक मुहीम शुरू कर रहे हैं-स्त्रीकाल में ‘स्त्री नेतृत्व...

स्त्रीकाल के साथ पत्रकारिता करें, इंटर्नशिप करें

साथियो, आप कहीं भी हों, किसी भी शहर में, यदि आप जर्नलिज्म के विद्यार्थी हैं या स्त्री अध्ययन और जेंडर स्टडीज के विद्यार्थी हैं, तो...
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लोकप्रिय

भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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