स्त्रीवाद

माहवारी का ब्योरा नौकरी के लिए क्यों जरूरी (?) : बेड़ियां तोडती स्त्री: नीरा...

“जब हम भारतीय महिलाओं के लिए समान अधिकारों की संवैधानिक गारंटी प्राप्त करने के लिए आगे बढ़...

नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली अफ्रीकी-अमेरिकी महिला–टोनी मॉरिसन

राजीव सुमन टोनी मॉरिसन को सामजिक मुद्दों पर अपनी सूक्ष्म और स्पष्ट दृष्टिकोण रखने के साथ-साथ उनके तीक्ष्ण शब्द...

प्रलेस की एक सदस्या की खुली चिट्ठी :पितृसत्ता के खिलाफ हर लड़ाई में हम...

आरती संजीव जी, इस मुद्दे को आप मुझे व्यक्तिगत भी भेजते रहे हैं, काफी दिनों से पढ़ रही...

स्त्री-पुरूष सहजीवन और प्रेम का प्राचीन स्वरूप

स्त्री-पुरूष संबंध के प्राचीन स्वरूप को समाज में स्त्री-पुरूष के बीच पनप रही नवीन संबंध की व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। और समाज में सहजीवन संबंध के तेजी से बढ़ते उदाहरण, कानून द्धारा प्राप्त सहमति समाज में स्त्री-पुरूष संबंध की एक सकारात्मक परिवर्तन की दिशा देने के संदर्भ में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। नीजि संपत्ति और स्त्री पर पुरूष के आधिपत्यस्वरूप एकविवाह प्रथा की शुरूआत हुई। विवाह स्त्री-पुरूष संबंध का कृत्रिम व सुनियोजित आधार बना ना कि स्वाभाविक संबंध। जबकि सहजीवन स्त्री-पुरूष प्रेम और सहयोग के कारण उत्पन्न स्वाभाविक संबंध था।

लेखक संगठनों को समावेशी बनाने के सुझाव के साथ आगे आये लेखक: प्रलेस से...

पिछले कुछ दिनों से लेखिकाएं और लेखक प्रगतिशील लेखक संगठन की कार्यप्रणाली और उसमें ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक वर्चस्व पर सवाल उठ रहे...

कश्मीर के आईने में शेष भारत का विकास और मर्दवादी चेहरा

लेकिन कोई बात नहीं। जब भक्त लोग कब्जा जमा लेंगे तो यहाँ की महिलाओं की हालत भी आप जैसी हो जाएगी। स्वर्ग को नर्क बनाने मे ज़्यादा वक़्त थोड़ी लगता है।

वैवाहिक बलात्कार और हिंसा: एक अध्ययन

राजलक्ष्मी एक पति अपनी पत्नी का बलात्कार कैसे कर सकता है? वैवाहिक बलात्कार की जब भी बात होती है तो यह सवाल...

लेखिका ने गिनाये प्रगतिशील लेखक संघ के महिला विरोधी निर्णय: संघ सेक्सिस्ट पुलिसवाले के...

उस समय विवाद उठा था कृष्ण कल्पित जी कि कुछ पहले अनामिका जी से कि गई बदतमीजी पर। लेकिन वी॰एन॰ राय भी वहाँ मौजूद थे। वहाँ भी सवाल उठाया था, जवाब मिला, “जब मैत्रेयी पुष्पा जी उत्सव मे मौजूद हैं और उन्हे कोई ऐतराज नहीं तो किसी को क्यों ऐतराज हो ।“ खैर, इस साल जब वे नहीं थे तो हमे लगा कि शायद हमारे कहने का कुछ असर हुआ हो। लेकिन कहाँ साहब ? यहाँ तो वरिष्ठ कवि, मंच से ही महिला विरोधी गाली दे गए और विरोध केवल मैंने और सुजाता ने दर्ज किया । वैसे संबंध हमारे समानान्तर साहित्य उत्सव के सभी आयोजकों से बहुत अच्छे हैं ।

लेखक संगठन (प्रलेस) ने स्त्री अस्मिता पर मर्द दरोगा को दी तरजीह

प्रलेस के इस महिलाविरोधी रवैये से अब महिलाओं को कुछ करना चाहिए। चुप रहने और बर्दाश्त करने की भी एक सीमा होती है। अब कहना ज़रूरी हो गया है। जब सिर्फ ऐतराज और शिकायत दर्ज करने से कोई सुनवाई नहीं हो रही है तो शायद ज्यादा कड़ा कदम उठाना चाहिए। लगता है कि सभी महिला सदस्यों को प्रलेस से सामूहिक इस्तीफा देने जैसा कदम उठाना चाहिए।

मिसोजिनी, नायकत्व और ‘कबीर सिंह’

‘कबीर सिंह’ की कई समीक्षाओं में कबीर को एक ‘रिबेलियस एल्कोहोलिक’ बताया गया है। पर यहाँ सवाल यह उठता है कि अगर फ़िल्म का नायक रिबेल, यानी विद्रोह करता है तो किस के प्रति? अपने परिवार के प्रति? अपने कॉलेज-प्रशासन के प्रति जो उससे अनुशासन की मांग करता है? या फिर एक पिता के प्रति जो अपनी बेटी के लिए उसे अनफ़िट पाता है?
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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