कठमुल्लों को चेतावनी संघियों को इशारा : हाथ तोड़कर अल्लाह के भरोसे छोड़ देंगी...

काउंसिल ऑफ़ इस्लामिक आईडियोलॉजी (CII) की महिला सुरक्षा बिल में पतियों द्वारा पत्नियों की हल्की पिटाई की सिफारिश का सोशल मीडिया पर मुखर विरोध...

प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री

( रानी कुमारी के द्वारा 'प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री' विषय पर आयोजित संगोष्ठी की रपट।  रानी दिल्ली वि वि में शोधरत  हैं....

बहन के नाम राजनीतिक पत्र

संजीव चंदन प्रिय बहन,  मुझे याद है कि तुम कितनी खुश थी जब उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय के हॉस्टल में तुम्हें प्रवेश मिला था. 21वीं...

‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ (तृतीय) के लिए आवेदन / संस्तुतियां आमंत्रित

स्त्रीकाल के द्वारा तृतीय  'सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान' (तृतीय) के लिए आवेदन / संस्तुतियां  15 दिसंबर  2016 तक आमंत्रित हैं. सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान...

एक अंग्रेज़ी-भाषी बंगाली दलित महिला की कशमकश

दृशद्वती बार्गी   जाधवपुर विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नात्कोत्तर. स्त्री अध्ययन केंद्र से एमफिल . संपर्क drishadwatibargi@gmail.com ( यह आलेख हर किसी को...

पुस्तक मेले की 'मानुषी' से गायब गैरद्विज स्त्री

दिल्ली में 'वर्ल्ड बुक फेयर' नाम से किताबों का सात दिनों का मेला आज यानी रविवार, 15 जनवरी, को समाप्त होगा- अपने अंतिम दो...

फिल्म कक्कुज (पखाना) की निर्माता दिव्या भारती किसके निशाने पर ?

कुमुदिनी पति  विवाद , समाज और सियासत, दिव्या भारती अपने गृह-राज्य तमिलनाडु से बाहर रहने के लिए मजबूर कर दी गईं हैं।उनके कुछ करीबी मित्रों के...

एक सांस्कृतिक आंदोलन के चार साल

प्रमोद रंजन व रवि प्रकाश ( देश में एक धीमा सांस्कृतिक आन्दोलन करवट ले रहा है , एक क्रांति घटित हो रही है , जिसकी...

बलात्कार के विरोध में आवाज बनी बेला भाटिया को मिली घर छोड़ने की धमकी

बस्तर के आदिवासियों के बीच काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया को कुछ अज्ञात लोगों ने बस्तर छोड़ देने की धमकी दी थी....

आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : तीसरी किस्त

रमणिका गुप्ता रमणिका गुप्ता स्त्री इतिहास की एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं . वे आदिवासी और स्त्रीवादी मुद्दों के प्रति सक्रिय रही हैं . 'युद्धरत...
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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