मी लार्ड, यहाँ महिलाओं को न्याय नहीं न्याय का स्वांग मिलता है

फिलहाल, मुख्य न्यायाधीश को क्लीन चिट दिए जाने के फैसले के खिलाफ, आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पूर्व महिला कर्मचारी जल्द ही अदालत में अपील करेगी, मामला क्या रुख लेता है ये तो आनेवाला समय ही बताएगा लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि इस मामले को जिस तरह से निपटाया गया है उससे कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ महिलाओं की इंसाफ की लड़ाई कमजोर हुई है।

बेंगलुरू: धिक्कार है! लड़कियों की संख्या से आपत्ति है!!(लड़कियों के लिए हाई कट ऑफ़...

मतलब यदि लड़कों की संख्या अधिक है तो आपको कोई आपत्ति नहीं है लेकिन यदि लड़कियों की संख्या अधिक होने लगी तो आप परेशान हो गए। जैसा कि पूर्व में कहा कि कुलपति जैसा व्यक्ति यह बयान देता है कि ‘ज्यादा कट ऑफ़ नहीं होगा तो कॉलेज में सिर्फ़ लड़कियाँ होंगी’।

औरतें अपने दु:ख की विरासत किसको देंगी

माँ-बेटी के आपसी संवाद एक दूसरे के पूरक नजर आते हैं। जिन्दगी के सारे रंग खासकर स्त्री जीवन के सारे रंग हर्ष, ख़ुशी, उत्साह, दुःख, शोक, वियोग, अकेलापन आदि एक दूसरे से गूंथे हैं। “ऐ लड़की अँधेरा क्यों कर रखा है! बिजली पर कटौती! क्या सचमुच ऐसी नौबत आ गई है”

सत्ता में भारतीय महिलाओं की उपस्थिति: सामर्थ्य, सीमाएँ एवं संभावनाएँ

अन्तरराष्ट्रीय मंचो पर महिला प्रश्न पर चली आ रही बहस और आन्दोलन का अपना एक लम्बा इतिहास रहा है। पूरे विश्व में विधायिकाओं में सिर्फ 10.5 प्रतिशत महिलाएँ हैं और मंत्री पद पर सिर्फ 6 प्रतिशत महिलाएँ है। हमारे देश की स्थिति हमारे पड़ोसी देशों से भी बदतर है। हमारे देश में भी महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण का प्रश्न अचानक ही उत्पन्न नहीं हुआ। 1947 में महिलाओं की स्थिति के संबंध में तैयार हुई रिपोर्ट में एक पूरा अध्याय ही महिलाओं की राजनीतिक स्थिति के बारे में था और इसमें विशेष रूप से इस बात का उल्लेख किया गया था कि महिलाओं की खराब स्थिति के लिए उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति के साथ ही उनकी राजनीतिक स्थिति भी जिम्मेदार है और इससे उबरने के लिए विधायक निकायों में आरक्षण के बारे में कहा गया था.

अम्बेडकर की प्रासंगिकता के समकालीन बयान

महितोश मंडल का कहना है कि विश्वविद्यालयों में दुनिया भर के तमाम चिन्तक पढ़ाए जाते हैं पर अम्बेडकर की सतत अनुपस्थिति और बहिष्करण की राजनीति के पीछे अम्बेडकर के प्रति ब्राह्मणवाद की घृणा है, और यह घृणा दुश्चिंता से उपजी है. दरअसल अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म और ब्राह्मण सभ्यता के विरुद्ध कोई आधारहीन शोर-गुल नहीं किया है, बल्कि वे कानून के विद्यार्थी थे और बहुत ही तर्कपूर्ण व प्रासंगिक ढ़ंग से उन्होंने ब्राह्मणवाद की आलोचना प्रस्तुत की है. यदि युवा विद्यार्थी अम्बेडकर के आमूल परिवर्तनवादी विचारों को गंभीरता से पढ़ना शुरू करें, तो अकादमिक जगत से लेकर राजनीति, अर्थव्यवस्था, मीडिया, साहित्य, सिनेमा, और इत्यादि तक फैले राष्ट्र-व्यापी ब्राह्मणवादी साम्राज्य को भयंकर चुनौती मिलेगी.

कानूनी भेदभाव: बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री (सी.बी.मुथम्मा)

उल्लेखनीय है कि अदालत में बहस के दौरान महाधिवक्ता सोली सोराबजी ने सरकार की तरफ से दलील दी थी कि महिलाओं द्वारा विवाह करने की स्थिति में, गोपनीय और महत्वपूर्ण सरकारी सूचनाओं और दस्तावेजों के लीक होने का खतरा या संभावना बढ़ सकती है। इस पर न्यायमूर्ति अय्यर ने पूछा था "क्या पुरुषों द्वारा शादी करने से यह खतरा या संभावना शून्य है?"

हिंदू कोड बिल और डॉ. अंबेडकर

डॉ. अंबेडकर राजनीति के आकाशगंगा के ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं जिनकी छवि कालांतर में भी धूमिल नहीं हो...

भाजपा सीएम की पत्नी उनके खिलाफ उत्पीड़न और घरेलू हिंसा की शिकायत लेकर पहुँची...

देब ने 2018 में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी. वे वहां के लोकप्रिय मुख्यमंत्री मानिक सरकार को सत्ता से हटाकर मुख्यमंत्री बने थे और इस तरह वामपंथी सरकार के बदले वहां आज भाजपा की सरकार है. ।

न्यायपालिका में यौन शोषण का मामला पहला नहीं है और न्याय नहीं हुआ तो...

समाचार है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपने खिलाफ़ यौन उत्पीड़न की जाँच, न्यायमूर्ति बोबड़े को सौंप दी है। न्यायमूर्ति बोबड़े ने आंतरिक समिति में, न्यायमूर्ति एन. वी.रमन्ना और इंदिरा बनर्जी को रखने का फैसला लिया है। काश! यह फैसला शनिवार को ही ले लिया गया होता, तो कितना बेहतर होता। किसी को यह नहीं लगता कि मीडिया, सुप्रीम कोर्ट बार या किसी और दबाव-तनाव में लिया फैसला है। खैर... न्यायिक विवेक जागा तो सही, भले ही थोड़ी देर से।

हम क्रूर और कामातुर पूर्वजों की संतानें हैं:क्रूरता की विरासत वाले देश में विधवाओं...

किन्तु, एक बार मैंने भी यह बात एक हिंदू के मुंह से सुनी थी। उसने खुलकर कहा था-‘हम अपनी पत्नियों को अक्सर इसलिए, दुःखी रखते हैं, क्योंकि हमें यह डर रहता है कि कहीं वे हमें जहर न दे दें। इसलिए हमारे ज्ञानी पुरखों ने विधवाओं को भयानक रूप से दंडनीय बनाया था, ताकि कोई भी स्त्री जहर देने का साहस न कर सके।’
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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