भारत में दलित स्त्री के स्वास्थ्य की स्थितियां और चुनौतियाँ

संदीप कुमार मील समाज के किसी भी तबके की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के निर्माण में उसके स्वास्थ्य की स्थितियाँ बहुत निर्णायक भूमिकाएँ...

सैनिटरी नैपकिन जीएसटी मुक्त: महिलाओं की मुहीम ने लाया रंग

स्त्रीकाल डेस्क  केंद्रीय वित्त मंत्री पीयूष गोयल की अध्यक्षता में जीएसटी काउंसिल की 28वीं बैठक में महत्वपूर्ण फैसले लिए गए हैं.  मनीष सिसोदिया सहित अलग-अलग...

स्लिम रहने से ज्यादा जरूरी है स्वस्थ रहना

नीवा सिंह राष्ट्रीय कैडेट कोर,दिल्ली,  की गर्ल्स कैडेट इंस्ट्रक्टर नीवा सिंह से मासिक फिटनेस, पोषण और टीन एजर लडकियों को लेकर रंजना ने किया संवाद....

लगभग 25 करोड़ अनीमिया ग्रस्त महिलाओं को लेकर दौड़ेगी बुलेट ट्रेन (!)

स्त्रीकाल डेस्क  ठीक उसी दिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की जनता को बुलेट ट्रेन का सपना बेच रहे थे संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक...

#टॉक.. सेक्स स्त्री यौनिकता का उत्सव अभियान

इन दिनों हैश टैग टाक सेक्स सोशल मीडिया पर वाइरल हो रहा है. यह लन्दन के 23, पॉल स्ट्रीट के “स्कारलेट लेडिज” के भव्य...

वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड भेजने की मुहीम: एसएफआई और कई संगठनों ने देश...

क्वीलिन  काकोती आधी आबादी महिलाओं की है, लेकिन उन्हें अपने छोटे से हक के लिए भी पुरुष तंत्र से लड़ना पड़ता है. इस देश में...

स्वच्छ भारत अभियान की सच्चाई जानें: महिला एक्टिविस्ट ने उठाये सवाल

महिला एक्टिविस्ट ममता दास ने खोली स्वच्छ भारत अभियान की पोल. घरों में तो किसी तरह बन गये शौचालय, जिसका इस्तेमाल नहीं होता, लेकिन...

बीजेपी की महिला विधायक ने सेनेटरी पैड से जीएसटी हटाने के लिए लिखा वित्तमंत्री...

स्त्रीकाल डेस्क  मध्यप्रदेश से भारतीय जनता पार्टी की विधायक पारुल साहू ने वित्त मंत्री अरुण जेटली को पत्र लिखकर सेनेटरी नैपकिन से जीएसटी हटाने की...

उस पेड़ पर दर्जनो सैनिटरी पैड लटके होते थे

संजीव चंदन  स्त्रियों के लिए माहवारी को टैबू बनाया जाना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है. इसे गोपनीय,  टैबू और लज्जा का विषय बनाने में यह प्रक्रिया न...

दिलचस्प रही माहवारी के सम्बन्ध में मेरी पहली जानकारी

 नवल किशोर कुमार स्त्रियों के लिए माहवारी को टैबू बनाया जाना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है. इसे गोपनीय,  टैबू और लज्जा का विषय बनाने में यह प्रक्रिया...
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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