सामूहिक नसबंदी के कारण भारतीय स्त्रियों की मौतें: लुटे हुए विकल्प व स्त्री गरिमा

 ( बिलासपुर में नसबंदी के कारण महिलाओं की मौत के कारणों की पड़ताल के लिए चार महिला -स्वास्थ्य संगठनों ने संयुक्त रूप से एक...

सेलेब्रटिंग कैंसर

विभा रानी लेखिका, रंगमंच में सशक्त उपस्थिति, संपर्क :मो- 09820619161 gonujha.jha@gmail.com ‘आपको क्यों लगता है कि आपको कैंसर है?’ ‘मुझे नहीं लगता.‘ ‘फिर क्यों आई...

दिलचस्प रही माहवारी के सम्बन्ध में मेरी पहली जानकारी

 नवल किशोर कुमार स्त्रियों के लिए माहवारी को टैबू बनाया जाना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है. इसे गोपनीय,  टैबू और लज्जा का विषय बनाने में यह प्रक्रिया...

स्लिम रहने से ज्यादा जरूरी है स्वस्थ रहना

नीवा सिंह राष्ट्रीय कैडेट कोर,दिल्ली,  की गर्ल्स कैडेट इंस्ट्रक्टर नीवा सिंह से मासिक फिटनेस, पोषण और टीन एजर लडकियों को लेकर रंजना ने किया संवाद....

मातृ-मृत्यु का नियंत्रण महिला -स्वास्थ्य का जरूरी पहलू : चार्म

डाॅ. शकील-उर-रहमान ( कल बिहार में नालंदा सहित अन्य जिलों के विधानसभाओं में मतदान होने जा रहा है. पिछले दो चरणों में महिला मतदाताओं ने...

उस पेड़ पर दर्जनो सैनिटरी पैड लटके होते थे

संजीव चंदन  स्त्रियों के लिए माहवारी को टैबू बनाया जाना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है. इसे गोपनीय,  टैबू और लज्जा का विषय बनाने में यह प्रक्रिया न...

महावारी से क्यों होती है परेशानी

आरती रानी प्रजापति  महावारी हर स्त्री के 10-14 की आयु में शुरू होने वाला नियमित चक्र है| जिसमें स्त्री की योनि से रक्त का स्त्राव...

लगभग 25 करोड़ अनीमिया ग्रस्त महिलाओं को लेकर दौड़ेगी बुलेट ट्रेन (!)

स्त्रीकाल डेस्क  ठीक उसी दिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की जनता को बुलेट ट्रेन का सपना बेच रहे थे संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक...

पितृसत्ता से आगे जहाँ और भी है

राहुल सिंह युवा आलोचक, हिन्दी साहित्य का  प्राध्यापक संपर्क : alochakrahul@gmail.com इस समय प्रचलित विमर्शों की गर थोड़ी जानकारी हो तो निश्चित तौर पर आप स्त्री...

मासिक धर्म : आखिर चुप्पी कब तक ?

सुनीता धारीवाल सामाजिक कार्यकर्ता . ब्लॉगर , कानाबाती ब्लॉग की मोडरेटर. सभी जीवो की मादाएं अपनी  प्रजनन क्षमता के कारण अपने अपने समाज में  उच्च...
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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